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ज्ञानेश्वरी में स्थित वाङ्मयगणेश

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आज ज्ञानेश्वरी ग्रंथ की जयंती है. मनुष्य के जीवन में ‍उपयुक्त मार्गदर्शन करने वाला कालातीत ग्रंथ है ज्ञानेश्वरी. शके १२१२ यानि सन् १२९० में लिखे गये ज्ञानेश्वरी का आज भी ग्रंथराज के रूप में गौरव किया जाता है. किसी दार्शनिक ग्रंथ की जयंती समाज में मनाया जाना उस ग्रंथ की महानता का और समाज की भी प्रगल्भता का लक्षण है. प्राचीन काल में ग्रंथ को हाथों से नकल करके उसकी प्रति बनाई जाती थी. इस प्रक्रिया में कुछ पाठभेद उत्पन्न होते चले गए, जिसके कारण संत एकनाथ ने शके १५०६ में ज्ञानेश्वरी के पाठभेद दूर करते हुए मूल शुद्ध ग्रंथ प्रकाशित किया. वह काम जिस दिन समाप्त हुआ, उस दिन की तिथि यानि भाद्रपद कृष्ण षष्ठी इस दिन का उल्लेख उपलब्ध होने के कारण यह दिन ज्ञानेश्वरी की जयंती के तौर पर मनाया जाता है.

वेद उपनिषदों का सार व्यासमुनि ने भगवद्गीता के रूप में दिया. संत ज्ञानेश्वर ने वही ज्ञान प्राकृत भाषा में लाते हुए दर्शन को भाषा की सुंदरता, तरल काव्य प्रतिभा, अलौकिक उपमा रूपक आदि अलंकारों और अमृत के समान माधुरी से जोड़ दिया. ज्ञानेश्वरी ग्रंथ की रचना करते समय प्राचीन महाकाव्य जिस पद्धति से लिखे जाते थे, उसी शास्त्र सम्मत पद्धति का अनुसरण संत ज्ञानेश्वर ने किया है. इसी कारण वे ग्रंथ के आरंभ में श्रीगणेश व शारदा का वंदन और श्री गुरू को नमन करते हैं. ज्ञानेश्वरी के आरंभ में गणेश का मंगलाचरण यानि गणपति पर लिखा गया अर्थपूर्ण और नितांत सुंदर एक स्वतंत्र काव्य ही है. यह श्री गणेश की केवल स्तुति नहीं, बल्कि श्री गणेश के रूप का सच्चा वर्णन है. उन्होंने यह कल्पना की कि गणेश की मूर्ति यानि संपूर्ण वेद वाङ्मय की मूर्ति है और उसका वर्णन किया.

ॐकार यह परब्रह्म स्वरूप का प्रथम नादरूप प्रतीक है. उसके उच्चारण से स्वरूप का ज्ञान होता है. इस ज्ञान के साथ एकरूपता का एहसास होता है और उससे जो होता है, वह सच्चा ‘नमन’. विश्व का निर्माण करने के बाद परमेश्वर द्वारा उस पर लगाई गई अपने नाम की मुहर यानि ॐ. ऐसे आदिबीज ओंकार से विस्तार होते गए शास्त्र व दर्शन, उनमें से साकार हुआ और विस्तार होने वाला दर्शन, यह शब्द ब्रह्म के रूप में अविष्कार ही गणेश का असली रूप है. इसलिए वह आदिदेव. अपनी किसी भी कृति में इसका यानि सिद्धांत का, विचारों का अधिष्ठान हो तो वह बिना किसी बाध के संपन्न होता ही है.

ॐ नमो जी आद्या. वेद प्रतिपाद्या.

जय जय स्वसंवेद्या. आत्मरुपा ॥

देवा तूचि गणेशु. सकलमतिप्रकाशु ॥

म्हणे निवृत्तीदासु. अवधारिजो जी ॥

और फिर सीधे

अकार चरण युगुल. उकार उदर विशाल.

मकार महामंडल. मस्तकाकारे॥

हे तिन्ही एकवटले.

तेथ शब्दब्रह्म कवळले.

ते मियां श्रीगुरुकपा नमिले.

आदिबीज.

गणेश स्तवन की पंक्तियां हम जानते हैं. लेकिन माऊली (संत ज्ञानेश्वर) ने इस ग्रंथ की सिद्धी के लिए जो माऊली (संत ज्ञानेश्वर) ने २१ ओवियों (एक छंद) वाला. वह ‘ते श्री शारदा विश्वमोहिनी नमस्कारिली मियां.’ इस ओवी के पास समाप्त होता है. माऊली ने कल्पना की कि यह गणेश मूर्ति ही समस्त वेद वाङ्मय की मूर्ति है.

हे शब्दब्रह्म अशेष. तेंचि मूर्ति सुवेष.

तेथ वर्णवपु निर्दोष. मिरवत असे ॥३॥

आरंभ में उसे ‘वेदप्रतिपाद्य’ यानि सबका मूल ‘आद्य’, जिसका स्वरूप जानने के लिए वेदों का आधार लेना पड़ेगा ऐसा और जिसे केवल अपनी आंतरिक संवेदना और ज्ञान से जाना जा सकेगा ऐसा सर्वव्यापी, आत्मरुप गणेश कहा है. वही सबकी बुद्धि में प्रकाश फैलाता है.

ऐसा लगता है कि ऐसा रसमय ज्ञानमय मोदक ही माऊली हमें खिला रहे हैं! ज्ञानेश्वरी को आधुनिक समय में संपूर्ण दर्शन समझने के लिए पहली सीढ़ी माना जा सकता है. ज्ञानेश्वरी के कारण गीता समझ में आती है. गीता के कारण महाभारत व भागवत पढ़ने की इच्छा होती है. उससे वेद उपनिषदों का अध्ययन करने की इच्छा होती है. जानकार कहते हैं कि इस तरह यह नीचे से ऊपर, संसार से मोक्ष की ओर ले जाने वाली श्रृंखला है! पहली ही कक्षा में थोड़ी सी रूची जगाने का काम माऊली बड़ी चतुराई से करते हैं, यह निश्चित है..

विनीता तेलंग

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