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वीर बाल दिवस – गुरुपुत्रों का बलिदान और मुगलिया दहशतगर्दी

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नरेंद्र सहगल

क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की मजहबी दरिंदगी और दहशतगर्दी को खुली चेतावनी देने वाले गुरु पुत्रों के महान बलिदान का संबंध किसी एक क्षेत्र, प्रांत, और साम्प्रदाय के साथ नहीं है. यह बलिदान भारत राष्ट्र की वीरव्रती सनातन धरोहर की एक सशस्त्र कड़ी है. उल्लेखनीय है कि दशमेश पिता श्रीगुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज द्वारा सृजित ‘खालसा पंथ’ ने औरंगजेब की आततायी मानसिकता और उसकी गैरइंसानी हरकतों को सदैव के लिए दफन कर दिया था.

त्याग और शौर्य की अनूठी मिसाल गुरु पुत्रों के बलिदान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “न भूतो न भविष्यति” कह कर अपनी श्रद्धांजलि दी है. वास्तव में चारों साहिबजादों के बलिदान वीर अभिमन्यु, प्रह्लाद, ध्रुव, नचिकेता एवं भरत जैसे वीर भारतीय पुत्रों की विरासत को जीवित रखने का महान उपकर्म है.

गुरु पुत्रों ने अपने बलिदानों से सारे भारत राष्ट्र के स्वाभिमान को पुनः जीवित कर दिया. अतः इस ‘वीर बाल दिवस’ पर सभी भारतवासियों को जाति, बिरादरी, कौम, प्रांत, और भाषा की संकीर्णता को छोड़कर एक राष्ट्र पुरुष होने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए और उन लोगों के नापाक इरादों को चुनौती देनी चाहिए जो भारत रक्षक खालसा पंथ और इसके बलिदानों पर अलगाववाद का रंग चढ़ाते हैं.

अपनी आत्मकथा बचित्र नाटक में श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने कहा है – “सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, जगे धर्म हिन्दू तुर्क द्वंद भाजै” अपने इस ध्येय वाक्य को इस महान संत योद्धा ने अपने समस्त परिवार की आहुति देकर साकार किया. आज देश और विदेश में ‘वीर बाल दिवस’ मनाकर समस्त धर्म एवं मानवता प्रेमी गुरु पुत्रों के महान बलिदान को श्रद्धापूर्वक नमन कर रहे हैं.

अनादि काल से आज तक विश्व के इतिहास में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, जब किसी योद्धा ने युद्ध के मैदान में अपना समस्त परिवार ही कुर्बान कर दिया हो. हमारे धर्मरक्षक खालसा पंथ की सृजना करने वाले दशमेश पिता श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज ने भारतीय संस्कृति, धर्म और स्वतंत्रता के लिए अपने पिता, चारों पुत्रों और अपनी माता को भी राष्ट्र की बलिवेदी पर बलिदान देने की न केवल प्रेरणा दी, अपितु अपने प्राणों का उत्सर्ग करते हुए देखा भी.

खालसा पंथ की सृजना के समय श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने अपने पांचों सिंह शिष्यों से प्रतिज्ञा की थी- “आपने मुझे अपना सर दिया है, मैं आपको अपना सरवंश दूंगा”. जब एक गुरु सिंह भाई दयासिंह ने कहा – “सच्चे पातशाह हमने तो अपने शीश देकर अमृतपान किया है. आप खालसा को क्या भेंट करोगे?” तुरंत दशमेश पिता ने उत्तर दिया – “मैं अपने सभी सुत खालसा (धर्मरक्षकों) की भेंट चढ़ाऊँगा. मैं स्वयं भी अपने सिंहों के बीच उपस्थित रहूँगा.” इतिहास साक्षी है कि दशमेश पिता ने अपनी प्रतिज्ञा को अक्षरश: निभाया.

यहाँ हम दशमेश पिता के चारों पुत्रों के महान बलिदान का संक्षिप्त वर्णन ही करेंगे. साहिबजादा अजीत सिंह (18 वर्ष), साहिबजादा जूझार सिंह (16 वर्ष), जोरावर सिंह (8 वर्ष) और साहिबजादा फतेह सिंह (6 वर्ष). चारों पुत्रों को श्रीगुरु ने अपनी देखरेख में शस्त्र विद्या एवं आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान की. देश और धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व त्याग करने के संस्कारों से ओतप्रोत थे चारों वीर पुत्र.

दशमेश पिता ने अपने मात्र 42 वर्ष के जीवन काल में मुगलों की दहशतगर्दी के विरुद्ध अनेकों युद्ध लड़े. परंतु ‘चमकौर की गढ़ी’ नामक स्थान पर लड़ा गया भयंकर युद्ध विशेष महत्व रखता है. इस युद्ध में मात्र 40 सिक्ख योद्धाओं ने हजारों मुगल सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे. श्रीगुरु और उनके सिक्ख सैनिकों ने किले के अंदर से तीरों की बौछार करके सैकड़ों मुगल सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया. अंत में श्रीगुरु ने अपने बड़े पुत्र बाबा अजीत सिंह को मात्र पांच सिक्ख सैनिकों के साथ किले के बाहर जाकर युद्ध करने का आदेश दिया.

मात्र 18 वर्षीय तरुण योद्धा ने शत्रुओं के घेरे को तोड़ा और शत्रुओं के बीच में जाकर अपनी तलवार के भीषण वारों से सैकड़ों मुगलों को काट डाला. महाभारत के युद्ध में 18 वर्षीय अभिमन्यु ने भी इसी तरह कौरव सैनिकों की घेराबंदी को तोड़कर चक्रव्यूह को भेदा था. इसी वीरव्रती इतिहास को बाबा अजीत सिंह ने चमकौर के युद्ध में दोहरा दिया था.

बाबा अजीत सिंह के बलिदान के बाद श्रीगुरु ने अपने दूसरे पुत्र 16 वर्षीय बाबा जूझार सिंह को युद्ध के मैदान में जाने का आदेश दिया. इस तरुण योद्धा ने भी अपनी तलवार के जौहर दिखाए और शत्रु सेना के बहुत बड़े हिस्से को यमलोक का रास्ता दिखाया. इस तरह दोनों वीर पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए. धन्य है ऐसा महान पिता जिसने अपने कलेजे के दोनों दुकड़ों को धर्म हेतु बलिदान कर दिया.

युद्ध के पश्चात श्रीगुरु का सारा परिवार बिखर गया. इनके दोनों छोटे बेटों को इनकी दादी गुरुमाता गुजरी जी सुरक्षित लेकर एक गाँव में पहुंची. इस समय दोनों बेटे जोरावर सिंह और फतेह सिंह 8 वर्ष व 6 वर्ष के थे. गाँव में गुरु परिवार का एक भक्त गंगू रहता था. इस गुरु भक्त ने पहले तो गुरु माता के सोने के जेवर और सिक्के चुराए और फिर शहर के कोतवाल को गुरुपुत्रों और माता की जानकारी दे दी. सरहिन्द के नवाब वजीर खान ने तीनों को गिरफ्तार करके एक अति ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया. इस परिस्तिथि की गंभीरता को भांप कर गुरुमाता दादी ने दोनों बच्चों को अपने धर्म पर अड़िग रहने की शिक्षा दी.

अगले दिन प्रातः नवाब वजीर खान ने दोनों बच्चों को दरबार में आने का आदेश दिया. दरबार का दरवाजा इतना छोटा था कि आने वालों को झुक कर अंदर जाना पड़ता था. दोनों वीरपुत्रों ने झुकने के बजाए पहले अपने पांव दरवाजे के अंदर किए और फिर भीतर गए. नवाब को सलाम तक नहीं किया. “बोले सो निहाल-सतश्री अकाल” से दरबार की दीवारों को हिला दिया.

इन्हें जब इस्लाम कबूल करने के लिए कहा गया तो दोनों ने गरजते हुए कहा – “हम दशमेश पिता कलगीधर गुरु गोबिन्द सिंह के पुत्र हैं और धर्म और मानवता के लिए बलिदान होने वाले श्रीगुरु तेग बहादुर के पौत्र हैं. हम अपने प्राण दे देंगे, परंतु धर्म नहीं छोड़ेंगे.”

दोनों वीर पुत्रों को जिंदा ही दीवारों में चिन देने का आदेश दिया गया. दोनों वीर पुत्रों ने ऊंची आवाज में उद्घोष किया – “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह”. जैसे-जैसे दीवार ऊंची होती चली गई, दोनों बालक उद्घोष करते रहे. स्वधर्म, मानवता और स्वतंत्रता के लिए बलिदान हुए गुरुपुत्रों ने बलिदान का अनूठा इतिहास रचा.

उधर, जब दोनों वीर पुत्रों के बलिदान का समाचार दादी माता गुजरी ने सुना तो उन्होंने भी प्राण त्याग दिए. हिन्दू राजा टोडरमल ने लाखों स्वर्ण मुद्राएं देकर कुछ भूमि खरीदी और दोनों वीर पुत्रों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की. इस स्थान पर ही गुरुद्वारा ज्योतिस्वरूप मौजूद है. गुरु पुत्रों के बलिदानी भूमि पर गुरुद्वारा फतेह सिंह है.

शत्- शत् प्रणाम.

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