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वीरव्रतधारी – अमर बलिदानी लाल पद्मधर सिंह

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी

सन् १८५८ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम से लेकर १५ अगस्त सन् १९४७ को सम्पन्न हुए स्वातन्त्र्य यज्ञ में असंख्य वीर – वीरांगनाओं ने भारत माता की परतन्त्रता की बेड़ियों को काटने के लिए सहज-सहर्ष अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया. तब जाकर स्वतन्त्रता की यह वैभवमयी, अप्रतिम झाँकी हमारे समक्ष अखण्ड ज्योति बनकर आलोकित हो रही है. स्वतन्त्रता की इस छाँव में राष्ट्र सतत गतिमान है और नित निरन्तर नए आयाम गढ़ रहा है. किन्तु इसके पीछे हमारे असंख्य राष्ट्रदूतों का बलिदान, उनके विचार, उनकी शक्ति एवं ओज ही है जो समस्त क्षेत्रों में परिलक्षित हो रहा है.

स्वतन्त्रता की बलिवेदी में अपने को आहुत करने वाले ऐसे ही महान क्रान्तिकारी हुए – पद्मधर सिंह. जिनका नाम लेते ही क्रान्ति की ऊर्जा तन- मन को झंकृत कर देती है. सतना जिले के कृपालपुर गाँव में १४ अक्तूबर, १९१३ को माता बुट्टन देवी व पिता प्रद्युम्न सिंह की चौथी सन्तान के रूप में उनका जन्म हुआ. भाइयों में गदाधर सिंह, शंखधर सिंह, चक्रधर सिंह के बाद चौथे क्रम में पद्मधर सिंह थे. वे बाल्यकाल से ही कुशाग्र बुद्धि के थे. घुड़सवारी करना, बन्दूक रखना व तलवार चलाना उन्हें अपनी वंश परम्परा से मिला था. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा समीपी ग्राम माधवगढ़ में हुई. तत्पश्चात आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें दरबार हाईस्कूल रीवा जाना पड़ा.

जब वे कक्षा दसवीं में थे, तब उनके विद्यालय के प्राचार्य /शिक्षक मि. टोपे ने उन पर प्रयोगशाला में रंगों के सात प्रकारों का भेद बताने वाली ‘प्रिज्म’ चोरी का झूठा आरोप लगा दिया. वे बार-बार अपने को निर्दोष बताते रहे, लेकिन मि. टोपे नहीं माना. वह पद्मधर सिंह को लगातार अपमानित व प्रताड़ित करने पर जुट गया. अन्ततोगत्वा जब उसने छात्रावास में पद्मधर सिंह के कमरे की तलाशी लेनी चाही, तब वे अपने अपमान की इस पराकाष्ठा के कारण क्रोधित हो उठे और उन्होंने कहा कि – अगर आप मेरे कमरे में तलाशी के दौरान प्रिज्म नहीं पाते हैं तो मैं आपको गोली मार दूँगा.

आखिरकार उस अंग्रेज शिक्षक ने उनके कमरे, आलमारी, बैग, कपड़े सहित कोने-कोने की छानबीन कर डाली. लेकिन जब उसे उनके कक्ष से कहीं भी प्रिज्म नहीं मिला. तब भी मि. टोपे उन पर चोरी का आरोप लगाते हुए अन्यत्र कहीं और प्रिज्म छिपाने की बातें कहते हुए फिर से परेशान करने लगा, इससे क्षुब्ध होकर पद्मधर सिंह ने मि. टोपे को गोली मार दी. जिससे वह घायल हो गया. कहा यह भी जाता है कि पद्मधर सिंह की गोली ने मि. टोपे को मौत की नींद ही सुला दिया था. इस घटनाक्रम के बाद उन्हें सात साल के कारावास की सजा सुनाई गई और उन्हें रीवा जेल में कैद कर दिया गया. लेकिन स्वाभिमानी पद्मधर सिंह के कार्य व्यवहार व उनके श्रेष्ठ आचरण को देखते हुए बाद में उनकी सजा को कम कर दिया गया. और वे तीन वर्ष की सजा काटकर जेल से छूट गए.

चूँकि वे डॉक्टर बनकर राष्ट्र सेवा करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने जीव विज्ञान में स्नातक की शिक्षा के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया. विज्ञान का विद्यार्थी रहते हुए भी हिन्दी साहित्य में उनकी खासी रुचि थी. इसीलिए उन्होंने विश्वविद्यालय से ही ‘राजपूत प्रभात’ नामक हस्तलिखित पत्रिका का भी शुभारम्भ किया था. वे जब बीएससी की पढ़ाई कर ही रहे थे. उसी समय महात्मा गाँधी के आह्वान पर जब ९ अगस्त, १९४२ को भारत छोड़ो आन्दोलन की शुरुआत हुई तो पूरा देश एक स्वर में – एक साथ क्रूर -बर्बर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उतर आया. युवाओं, विद्यार्थियों, महिलाओं सहित भारत के कोने-कोने से ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिलाने के लिए क्रान्ति का ऐसा शंखनाद हुआ कि ब्रिटिश सरकार आन्दोलन के दमन के लिए अपनी पूरी ताकत के साथ उतर पड़ी.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भी इस अभियान में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई थी. नौ अगस्त को विश्वविद्यालय में सभी विद्यार्थियों ने एक विशाल जुलूस निकाला.

उसके बाद दस अगस्त को विद्यार्थियों ने सभा करके अपने आगामी आन्दोलन की रणनीति बनाई थी. १२ अगस्त सन् १९४२ को छात्र-छात्राओं की टोलियाँ ‘इंकलाब जिन्दाबाद-अँग्रेजो भारत छोड़ो’ के नारे लगाते हुए विश्वविद्यालय के प्रांगण से कचहरी की ओर कूच करने लगी थी. विरोध दबाने के लिए तत्कालीन पुलिस अधीक्षक एस.एन. आगा ने आँसू गैस के गोले दागे, लाठीचार्ज करवाया. लेकिन वे उन इंकलाबी नायक-नायिकाओं के हौसले को कमजोर न कर सके. तब आन्दोलन को कुचलने के लिए आन्दोलनकारियों पर अंग्रेज अधिकारी डिक्सन के गोली चलाने का आदेश मिलते ही दस – दस मिनट के अन्तराल पर अंग्रेजी फौज ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरु कर दी.

घण्टों तक हुई उस फायरिंग से बचने के लिए कई छात्र – छात्राएं घायल होकर जमीन पर लेट गए. लेकिन उनमें से छात्रा नयनतारा सहगल व पद्मधर सिंह तिरंगा थामे अँग्रेजों के सामने डटे रहे. जब पद्मधर सिंह को यह भान हुआ कि अंग्रेज नयनतारा पर भी गोली चला सकते हैं, तो उन्होंने उनसे तिरंगा ले लिया. और काल के सामने सिंह गर्जना करते हुए ‘इंकलाब जिन्दाबाद-अंग्रेज़ो भारत छोड़ो, भारत माता की जय-वन्देमातरम्’ के नारे लगाते हुए अविचल अपने हाथों में तिरंगा थामे आगे बढ़ने लगे. उनका यह अद्भुत साहस देखकर अंग्रेज अचम्भित और भयकम्पित थे. इसलिए डिक्सन ने पुनः अकेले पद्मधर सिंह पर गोली चलाने का आदेश दिया. अगले पल एसपी आगा की बन्दूक से निकली गोली उस सिंहनी के शावक के वक्षस्थल को चीरती हुई निकल गई.

पद्मधर सिंह उसी गर्जना के साथ हाथों में झण्डा थामे तब तक नारे लगाते रहे, जब तक कि उनके शरीर से प्राण नहीं निकल गए. और वे निश्तेज होकर जमीन पर गिर नहीं पड़े. इस प्रकार आजादी के उस मतवाले वीरव्रती योद्धा ने अपने जीते-जी तिरंगे को झुकने नहीं दिया. उन्होंने अपना प्राणोत्सर्ग कर माँ भारती के चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया. प्रयागराज की पावन धरा में सतना की माटी के लाल ने स्वातन्त्र्य यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देकर क्रान्ति की ऐसी ज्वाला सुलगाई थी, जिसने अँग्रेजी सरकार की नींव को हिलाकर रख दिया. और उनसे प्रेरणा लेकर अनेकानेक क्रान्तिकारियों ने स्वातन्त्र्य समर में उनकी बलिदानी परिपाटी को अक्षुण्ण रखते हुए महनीय भूमिका निभाई.

प्रयागराज (इलाहाबाद) में १२ अगस्त १९४२ को भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग ले रहे विद्यार्थियों पर पुलिस ने गोली चलाई थी, जिसमें पद्मधर सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए थे.

उस समय अदालत में भूतपूर्व सब डिवीजनल ऑफिसर अमीर रजा साहब अपने कमरे में थे, और उन्होंने आँखों देखा बयान दिया था –

“मैंने निकट से देखा था कि पद्मधर सिंह की मौत कानूनन गोली चलाने से नहीं हुई, बल्कि जानबूझकर उनकी हत्या की गई. दो सौ निहत्थे छात्रों पर गोली चलाना युद्धभूमि का वीरतापूर्ण कार्य न था. उन लोगों ने एक घण्टे से अधिक समय तक गोली का सामना किया. इस स्थिति में लाठी और गोली की वर्षा की गई जो सर्वथा अनुचित था. मैं निश्चित रुप से कह सकता हूँ कि पुलिस ने दस-दस मिनट पर पाँच या छ: बार गोलियाँ चलाईं. गोली चलाने पर सभी छात्र अपने स्थान पर लेट गए, केवल एक लड़की खड़ी थी जो तनिक भी नहीं घबराई. एक छात्र भी झण्डा लिए खड़ा था. कुछ घुड़सवार पुलिस की आँखों में आँसू आ गए. एक वीर छात्र पुलिस के बगल में खड़ा था और यह कह रहा था कि -हम सभी भाई हैं. वह वीर छात्र गोली चलते रहने पर भी उनके बीच खड़ा था और अपनी बात दोहराता रहा था. पुलिस उसके कथन से इतनी प्रभावित हुई कि लज्जावश अपने मुँह को दूसरी ओर फेर लिया. इतना ही नहीं तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट डिक्सन का चेहरा उस स्थिति को देखकर उदासीन हो गया था. वे जब अपने अदालत के कमरे में जा रहे थे, तब उनके पैर लड़खड़ा रहे थे.”

पद्मधर सिंह की ब्रिटिश पुलिस द्वारा हत्या करने के बावजूद भी डिप्टी सुपरिटेंडेंट पुलिस एस.एन. आगा और सिटी मजिस्ट्रेट एन्थोनी के रुख में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. और सरकारी नीति के विरोध में अमीर रजा ने अपने डिप्टी कलेक्टर के पद से इस्तीफा दे दिया था. इससे यह सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है कि उस आन्दोलन में अँग्रेजों ने किस बर्बरता का परिचय दिया था. लेकिन कोई भी क्रांति की चिंगारी बुझा नहीं सके. बल्कि लाल पद्मधर सिंह का बलिदान स्वातंत्र्य क्रांति की नींव का जाज्वल्यमान अमर स्तम्भ बन गया.

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