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उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी ने गुवाहाटी में लोकमंथन 2022 का उद्घाटन किया

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गुवाहाटी. श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र परिसर में लोकमंथन-2022 का उद्घाटन गायन-बायन एवं बोड़ो समुदाय द्वारा दीप मंत्र से हुआ. लोकमंथन के आयोजक प्रज्ञा प्रवाह, सह-आयोजक असम टूरिज्म डिपार्टमेंट कॉर्पोरेशन (एटीडीसी) तथा स्थानीय आयोजक इंटेलेक्चुअल फोरम फॉर नॉर्थ इस्ट (आईएफएनई) हैं. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ उपस्थित थे. वहीं सम्माननीय अतिथि के रूप में असम एवं नगालैंड के राज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा उपस्थित थे. प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार भी मंच पर उपस्थित थे. इस अवसर पर निमंत्रित विशेष अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य तथा अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर  भी उपस्थित थे.

स्वागत भाषण में जे नंदा कुमार ने सभी अतिथियों के प्रति आभार प्रकट करते हुए भोपाल से शुरू होकर गुवाहाटी तक के लोकमंथन के इतिहास के बारे में और विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि गीता में भगवान कृष्ण ने लोक परंपरा का वर्णन किया है. सनातन सभ्यता की शक्ति के कारण ही यूरोपीय शक्ति विफल हुई है. हमारे लिए हमारा राष्ट्र सबसे पूजनीय है. हमारा देश हमारी माता है. भारतीय संस्कृति में हमें अपनी संस्कृति की प्रतिछवि प्रतिबिंबित होती है. देश की संस्कृति को बढ़ावा देने का अभियान सफल हो रहा है. उन्होंने कहा कि भले ही लोक शब्द का प्रयोग समाज को जाति, पंथ और धर्म में बांटने के लिए किया जाता है. लेकिन सनातन संस्कृति बताती है कि लोक परंपरा और संस्कृति एक उपहार है. आज के समारोह से हमारी सभ्यता अधिक मजबूत होगी.

मुख्य अतिथि उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि लोकमंथन के महान आयोजन से भारतीय लोक परंपरा और विरासत की रक्षा की आशा है. मीडिया के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि मीडिया को भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों का कैसे ख्याल रखना चाहिए. उन्होंने कहा कि संविधान में उल्लेख है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका इन तीनों ने काफी हद तक देश के विकास में बड़ी भूमिका निभाई. उन्होंने देश के संरक्षण के बारे में भी बताया. साथ ही उन्होंने भारत के इतिहास पर प्रकाश डाला तथा बताया कि हमने कैसे विभिन्न कष्टों को झेलते हुए अपनी लोक परंपरा को मुक्त किया. अंत में उन्होंने लोकमंथन से आजीवन संबंध विषय पर की चर्चा की.

सम्माननीय अतिथि असम के राज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी ने भारत की सभ्यता के बारे में कहा कि आजादी के 75वें वर्ष के बाद भी यह अभी भी एक विकासशील देश है. उन्होंने अपने देश के विकास की दिशा में कड़ी मेहनत करने पर बल दिया और कहा कि तेजी से सुधार के लिए एक जगह है. स्वामी विवेकानंद का कहना है कि शक्ति हमारे देश के नागरिक के अंदर है, हमारी धरती माता लोगों और जनजातियों की एकता के साथ उठेगी.

विशिष्ट अतिथि असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से भारत में केवल कुछ जनजातियाँ थीं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी संस्कृति थी. हमारे देश को सबसे पुरानी परंपरा और संस्कृति विरासत में मिली है. विष्णुपुराण में भी हमारी संस्कृति का वर्णन किया गया है. उन्होंने देश के भौगोलिक स्वरूप के बारे में भी विस्तार से चर्चा की. हमारी देशभक्ति हर नागरिक की आंखों में देखी जा सकती है. संस्कृति, एकता और विविधता ने हमें गौरवान्वित किया है. 15वीं सदी में श्रीमंत शंकरदेव ने असमिया कला और संस्कृति को समृद्ध किया. श्रीमंत शंकरदेव ने भारतीय आध्यात्मिता के स्वरूप पर बल दिया तथा असम को भारत से जोड़ने का भरपूर प्रयास किया. उत्तर पूर्व भारत की लोक संस्कृति जीवंत और मजबूत है. उन्होंने संस्कृति के हमलावर को जवाब देते हुए कहा कि हमारी संस्कृति 1947 में पैदा नहीं हुई. हमारी परंपरा और संस्कृति तब भी थी और अंतिम तक जीवित रहेगी.

मृदुस्मिता दास बोरा सत्रिया नृत्य प्रस्तुत तथा लोक परंपरा पर डॉ. कपिल तिवारी ने संभाषण दिया. वहीं भारत में आस्था और विज्ञान की लोक परंपरा विषय पर प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र, प्रो. नीरजा गुप्ता तथा डॉ. सच्चिदानंद जोशी तथा भारत में लोक परंपरा और वंशावली लेखन का महत्त्व विषय पर डॉ. रनोज पेगू (असम के शिक्षा मंत्री), डॉ. सुखदेव राव, डॉ. सुनीता रेड्डी तथा डॉ. भंवर सिंह राव ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए.

संध्या सत्र के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ. इस दौरान कर्नाटक का यक्षगान तथा कर्नाटक का जगती नृत्य कलाकारों ने प्रस्तुत किया.

साथ ही उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोक-नृत्यों की भी प्रस्तुति दी गई. इस दौरान असम का टोकारी गीत (धार्मिक गीत) हीरक ज्योति शर्मा ने प्रस्तुत किया. साथ ही त्रिपुरा का होजागिरी, असम का गुमराग नाच (मिसिंग जनजाति), सिक्किम का सिंघी चाम, असम का डोमाही किकांग (कार्बी जनजाति), मणिपुर का ढोल एवं ढोलक चालोम तथा मेघालय का वांगाला की भी प्रस्तुति दी गई. अंत में वाद्य प्रस्तुति के तहत टेटसेओ सिस्टर्स तथा दिक्षु शर्मा ने अपनी-अपनी प्रस्तुति दी.

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