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शांति के शत्रुओं से सतर्कता आवश्यक

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बलबीर पुंज

क्या कोई षड्यंत्र रचा जा रहा है? क्या यह विकास पथ को अवरुद्ध करके सांप्रदायिक हिंसा की लपटों में झोंकने की साजिश है? हाल ही कुछ घटनाएं, जो सतह पर अलग-अलग दिखती हैं, परंतु उन्हें एक अदृश्य सूत्र आपस में जोड़ता है. अभी 2 नवंबर को शाहजहांपुर में क्या हुआ? यहां मस्जिद में घुसकर कुरान जलाने के प्रकरण से क्षेत्र में तनाव बढ़ गया. अपमान की सूचना मिलते ही सैकड़ों की संख्या में मुस्लिम जुटे और उन्होंने भाजपा के विरुद्ध विरोध-प्रदर्शन करते हुए आगजनी शुरू कर दी. माहौल बिगड़ता देख पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने हेतु लाठीचार्ज कर दिया. जब घटनास्थल के निकट लगे एक सीसीटीवी को खंगाला गया, तो खुलासा हुआ कि इस ‘ईशनिंदा’ का अपराधी ताज मोहम्मद है, जिसे गिरफ्तार कर लिया गया. उसने ऐसा क्यों किया, इस पर मोहम्मद ने कहा, “मैंने नहीं, बल्कि मेरी आत्मा ने जलाया है.” यह विडंबना है कि बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों ने इस खबर को अपने न्यूज़ वेबपोर्टल पर तो लिया, परंतु अधिकतर न्यूज़ चैनलों और समाचार पत्रों में इससे दूरी बनाए रखी. यह बहुत दिलचस्प है, क्योंकि इन्हीं मीडिया संस्थानों ने अखलाक, जुनैद, पहलु आदि दुर्भाग्यपूर्ण मामलों को कई दिनों तक खींचकर रखा था.

उत्तरप्रदेश में इस प्रकार का मामला केवल शाहजहांपुर तक सीमित नहीं. इससे पहले 18 अक्तूबर को मेरठ में मोहम्मद शोएब द्वारा मंदिर में शिवलिंग पर पेशाब करने का वीडियो वायरल हुआ था. गिरफ्तारी के बाद उसे ‘मंदबुद्धि’ बता दिया गया. 10 अक्तूबर को सुल्तानपुर में मस्जिद के निकट भजन-गीतों के साथ निकली दुर्गा प्रतिमा विसर्जन शोभायात्रा पर उपद्रवियों की ओर से पथराव की खबर सामने आई थी, जिसमें 32 लोग गिरफ्तार हुए. इसी प्रकार, 7 सितंबर को माथे पर तिलक, जय श्रीराम का नारा लगाकर और अपना नाम शिवा बताकर घुसे तौफिक अहमद ने लखनऊ स्थित लेटे हनुमान मंदिर में प्रतिमा को खंडित कर दिया. बीते दिनों बिजनौर में भगवा परिधान पहने दो मुस्लिम भाईयों द्वारा मजारों में तोड़फोड़ करते हुए चादर को आग लगाने, तो लखनऊ स्थित लुलु मॉल में बिना अनुमति के नमाज पढ़ने का मामला भी सामने आया था.

आखिर उत्तरप्रदेश में इस प्रकार की घटनाओं का निहितार्थ क्या है? जब से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राज्य में सरकार आई है, तब से उनके प्रति दो प्रमुख जन-धारणाएं बनी हैं. पहली, कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने हेतु संगठित अपराध की कमर तोड़ना, तो दूसरी – जनहित योजनाओं के साथ उत्तरप्रदेश का विकास. समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खां और कुख्यात अपराधी विकास दुबे आदि पर कार्रवाई इस बात का प्रमाण है कि अपराधियों-आरोपियों के विरुद्ध विधिसम्मत कानूनी कार्रवाइयों में मजहबी और जातिगत पहचान रोड़ा नहीं बन रही है.

योगी सरकार की सख्त नीतियों का परिणाम है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, उत्तरप्रदेश में वर्ष 2021 में केवल एक सांप्रदायिक हिंसा, तो इसी अवधि में झारखंड में सर्वाधिक 100 मामले सामने आए हैं. यही नहीं, वर्ष 2019 की तुलना 2021 में इस विशाल राज्य में बाल-महिला अपराध भी घट गए हैं. हजारों अपराधियों के विरुद्ध गैंगस्टर अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही करते हुए उनकी सैकड़ों-हजार करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति कुर्क कर ली गई, तो उनकी अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चल गया. बिना किसी बल प्रयोग और बिना किसी विरोध-प्रदर्शन के विभिन्न धार्मिकस्थलों (मंदिर-मस्जिद आदि) में लगे सवा लाख लाउडस्पीकरों पर कार्रवाई तक कर दी गई. इस स्थिति से यथास्थितिवादियों में बौखलाहट बढ़ना स्वाभाविक है.

यदि योगी सरकार में कानून-व्यवस्था भंग होती या जानमाल पर खतरा बना रहता, तो क्या कोई उद्योगपति (विदेशी सहित) लाखों-करोड़ रुपयों का निवेश करता? – नहीं. यह अपराधियों के प्रति कड़ा दृष्टिकोण अपनाने का परिणाम है कि उत्तरप्रदेश की अर्थव्यस्था, 10 खरब डॉलर बनने की ओर अग्रसर है. इसके लिए योगी सरकार अगले पांच वर्षों में 40 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी. वर्ष 2018 के निवेशक सम्मेलन में, जो चार लाख 68 हजार करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव आए थे, उसमें तीसरे परिवर्तनात्मक समारोह (ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी- जीबीसी) के अंतर्गत 3 जून को 80,000 करोड़ रुपये की 1,406 परियोजनाओं का शिलान्यास किया गया था. इसमें सर्वाधिक 58,672 करोड़ रुपये का निवेश पश्चिमी उत्तरप्रदेश में हुआ. इससे पूर्व, पिछली दो जीबीसी में 1.28 लाख करोड़ के निवेश से 371 परियोजनाएं शुरू हुई थी. योगी सरकार ने वर्ष 2023 के ‘यूपी ग्लोबल इंवेस्टर समिट’ में 10 लाख करोड़ रुपये का निवेश लाने का लक्ष्य रखा है.

इस उपलब्धि में केंद्र सरकार के समर्थन से प्रदेश में बिछ रहे सड़कों के संजाल ने भी एक बड़ी भूमिका निभाई है. अधिकतर एक्सप्रेस वे इस मानक पर बनाए गए हैं कि आपातस्थिति में भारतीय वायुसेना अपने लड़ाकू जहाजों का संचालन यहां कर सके.

वास्तव में, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले उपरोक्त मामले उत्तरप्रदेश में हो रहे लंबित-वांछनीय परिवर्तन को देश-विदेश में कलंकित और शांति को भंग करने का षड़यंत्र है. स्वतंत्र भारत में उत्तरप्रदेश, सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील रहा है. रक्तरंजित विभाजन में भी इस क्षेत्र के वर्ग-विशेष की एक बड़ी भूमिका थी. जिन लोगों ने पाकिस्तान हेतु हिंसक आंदोलन चलाया, उसका एक बड़ा हिस्सा अपने सपनों के देश न जाकर यहीं रूक गया. चूंकि वर्ष 2017 से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पारदर्शी प्रशासन के माध्यम से प्रदेश में संवैधानिक-लोकतांत्रिक गरिमा और सरकार के इकबाल को पुनर्स्थापित किया है, इसलिए निजी स्वार्थ और वैचारिक खुन्नस के कारण इस सफलता को ध्वस्त करने हेतु विकृत तथ्यों के बल पर जहां भारत की छवि को कलंकित करने का प्रयास हो रहा है, तो वहीं समाज का एक वर्ग, जिनके विषैली चिंतन का दंश भारतीय उपमहाद्वीप 1300 वर्षों से झेल रहा है – वह सामाजिक समरसता को किसी भी कीमत पर बिगाड़ना चाहता है.

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं)

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