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पराक्रम दिवस – जब नेताजी ने अंग्रेजों के संसाधनों से लड़ी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई

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सौरभ कुमार

देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था. भारत का एक वीर सपूत देश से सैकड़ों किमी दूर बैठा देश की आजादी के लिए योजना बना रहा था, लेकिन सामने चुनौतियां बड़ी थीं और संसाधन कम. आजादी की लड़ाई के लिए सेना बनानी थी, लेकिन सेना के लिए न रसद की व्यवस्था थी, न हथियारों की. सबसे बड़ी चुनौती थी कि सैनिकों को ट्रेनिंग कैसे दी जाए? ऐसे में रास्ता निकाला गया कि क्यों न अपने दुश्मनों के संसाधनों का इस्तेमाल उनके ही खिलाफ किया जाए. जिन अंग्रेजों से लड़ना था, उन्हीं अंग्रेजों की ट्रेनिंग और हथियार उनके खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बनाई. इस योजना के सूत्रधार थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और विनायक दामोदर सावरकर.

हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया में एसएन सेन लिखते हैं कि 21 जून, 1940 को बोस की मुलाकात सावरकर से हुई. सावरकर ने बोस को भारत छोड़कर यूरोप जाने और वहां पर भारतीय सैनिकों को व्यवस्थित करने तथा जापान द्वारा ब्रिटेन पर युद्ध की घोषणा करते ही तुरंत हमला करने की सलाह दी थी. आजादी के दो दीवाने एक साथ काम कर रहे थे, नेताजी सेनापति की भूमिका में थे. वहीं छरहरे कदकाठी के सावरकर योजना बनाने में लगे थे. हिन्दू महासभा के दिनों से ही रास बिहारी बोस और वीर सावरकर के अच्छे सम्बन्ध थे. जब भारत में यह योजना बनाई जा रही थी, उस समय रास बिहारी बोस जापान में एक सेना का संगठन कर रहे थे. सावरकर इस बात से भली भांति परिचित थे. इसलिए उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को जापान जाने की सलाह दी. लेकिन अफ़सोस जुलाई 1940 में बोस को गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन जनवरी 1941 में वह बच निकले और भारत छोड़कर चले गए. जब बोस ने भारत की आजादी के लिए युद्ध और अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति का फायदा उठाने का फैसला लिया, तो उनके इस मिशन में सावरकर और रास बिहारी बोस अहम सहयोगी बन गए.

जापान में सुभाष चन्द्र बोस जब आजाद हिन्द फ़ौज को मजबूत बना रहे थे, तब भारत में सावरकर युवाओं को अंग्रेजी फ़ौज में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे. बड़ी संख्या में भारतीय युवक सावरकर की प्रेरणा से अंग्रेजों की सेना में शामिल होकर हथियार चलाना सीख रहे थे. आज भी कई लोग सावरकर के इस आह्वान का इस्तेमाल उनके खिलाफ करते हैं. उस समय भी सावरकर को खरी खोटी सुना रहे थे. उन्हें अंग्रेजों का पिट्ठू बता रहे थे, लेकिन सावरकर इन आलोचनाओं से परे अपनी योजना में व्यस्त थे. देश-हित के लिए अन्य त्यागों के साथ जन-प्रियता का त्याग करना सबसे बड़ा और ऊंचा आदर्श है, क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है – “वर जनहित ध्येयं केवल न जनस्तुति”.

अंग्रेजों को कानों कान खबर नहीं लगी कि किस तरह उनके ही संसाधनों का इस्तेमाल उनके खिलाफ किया जा रहा है. इस योजना के बारे में देश को पता तब चला जब 25 जून 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर एक सन्देश सुनाई दिया –

“जब राजनीतिक गुमराही और दूरदर्शिता की कमी के कारण, कांग्रेस पार्टी का हर नेता हिंद फौज के जवानों को भाड़े का सिपाही कहकर निंदित कर रहा है, वैसे समय में यह जानकर अपार खुशी हो रही है कि वीर सावरकर निर्भयतापूर्वक भारत के युवाओं को फौज में शामिल होने के लिए लगातार भेज रहे हैं. ये सूचीबद्ध युवा हमारी आजाद हिंद फौज के लिए सैनिकों और प्रशिक्षित पुरूषों के लिए स्वयं को हमें सौंपते हैं.”

नेताजी के इस मिशन में एक और अहम् सहयोगी थी अनुशीलन समिति. सावरकर से मिलने के बाद जब बोस ने विदेश जाने का फैसला लिया, अनुशीलन समिति भी सहयोग के लिए तैयार हो गयी. नेताजी सुभाष चंद्र बोस एंड इंडियन फ्रीडम स्ट्रगलः सुभाष चंद्र बोसः हीज आइडियाज़ एंड विजन’ में डॉ. मंजू गोपाल मुखर्जी लिखते हैं “इस मिशन में अनुशीलन समिति ने बोस की मदद की थी. सावरकर और रास बिहारी बोस के साथ संपर्क स्थापित किया गया था. अनुशीलन के त्रिदिब चौधरी इस मार्ग से बोस के भागने की संभावनाओं का पता लगाने और पहाड़ी जनजातियों की सहायता प्राप्त करने के लिए उत्तर पश्चिम फ्रंटियर प्रांत में एक सर्वेक्षण के लिए गए.”

इस अनुशीलन समिति के सदस्यों में एक नाम नागपुर के एक डॉक्टर का भी था, वो कोई और नहीं डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार थे. डॉ. हेडगेवार की मृत्यु से कुछ दिन पहले ही हितवाद (23 जून, 1940) और एक अंग्रेजी पत्रिका मॉर्डन रिव्यू दोनों ने ही बोस और हेडगेवार की मुलाकात की सूचना दी थी – “डॉ. हेडगेवार की 51 साल की उम्र में ही नागपुर में मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु से सिर्फ एक दिन पहले ही सुभाष चंद्र बोस उन्हें देखने गए थे.”

इस मुलाकात में क्या बात हुई, क्या योजना बनी इसका जिक्र कहीं नहीं मिलता. लेकिन एक बात तय है कि इस मुलाकात में भारत की स्वाधीनता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखा गया.

आज आजादी के 70 से ज्यादा सालों के बाद नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को वो सम्मान मिला है, जिसके वो असल हकदार हैं. भारत के वीर सपूत की जयंती अब पराक्रम दिवस के तौर पर मनाई जाएगी. आजाद हिन्द फ़ौज के शौर्य को अब लाल किले से सलामी दी जाएगी. लेकिन जब इस सलामी के लिए आप अपना सर ऊंचा उठाएं तो नेताजी के पराक्रम के साथ उन लोगों को भी पहचानने की कोशिश कीजिये, जिन्होंने कदम कदम पर उनका अपमान किया. मुखौटा लगाकार बैठे उन वामपंथियों को पहचानिए जिन्होंने नेताजी की ऐसे अपमानजनक कार्टून बनाए. ये तब भी भ्रम फैला रहे थे, ये आज भी भ्रम फैला रहे हैं. वो तब भी देशभक्तों का मखौल बना रहे थे वो आज भी बना रहे हैं.

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