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अंग्रेज़ भारत से क्यों भागे…? / 3

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हां, इसलिए अंग्रेज भारत छोड़कर भागे..!

प्रशांत पोळ

हमें यह पढ़ाया गया कि हमारी स्वतंत्रता हमने अहिंसक पद्धति से प्राप्त की. ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग, बिना ढाल…’ जैसे गीत भी बचपन से हमारी मानसिकता को बनाते रहे. परंतु वास्तविकता क्या थी ?

महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जो अहिंसक आंदोलन चलाए, उनका महत्व निश्चित ही था. जनजागरण के लिये यह आंदोलन उपयोगी सिद्ध हुए. सामान्य व्यक्ति इन आंदोलनों के माध्यम से देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ता गया. किंतु क्या अंग्रेज केवल इन आंदोलनों से ही भारत छोड़ने के लिये विवश हुए ?

वास्तविकता कुछ और ही चित्र प्रस्तुत करती है !

न्यायमूर्ति फणी भूषण चक्रवर्ती, कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश रह चुके हैं. १९५२ से १९५८ तक उनका कार्यकाल रहा है. इसी दरम्यान सन् १९५६ में, डॉ. हरेंद्र कुमार मुखर्जी के अचानक देहावसान के बाद, वे तीन महिने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल भी रहे हैं. इन्होंने ३० मार्च, १९७६ को लिखे पत्र में, उनके राज्यपाल के कार्यकाल का एक अनुभव लिखा है, जो महत्वपूर्ण है.

वे लिखते हैं, “जब मैं १९५६ में कुछ दिनों के लिये पश्चिम बंगाल का कार्यकारी राज्यपाल बना था, उन्हीं दिनों लॉर्ड क्लेमेंट एटली का कलकत्ता दौरा हुआ. वे दो दिन राजभवन में रहे. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वे ही ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे. और उन्हीं के कार्यकाल में भारत को स्वतंत्रता मिली थी. इसलिये मैंने उनसे सीधा प्रश्न किया, ‘गांधी जी के नेतृत्व वाला भारत छोड़ो आंदोलन तो १९४७ के बहुत पहले ही समाप्त हो गया था. बाद में कोई ऐसी परिस्थिति भी नहीं बन रही थी, जिसके कारण आप लोग भारत छोड़ कर चले जाएं. फिर ऐसा क्या कारण था कि इतनी जल्दबाजी में अंग्रेजों ने भारत से विदा ली ?”

“इसके उत्तर में एटली ने अनेक कारण गिनाएँ. उनमें से दो कारण प्रमुख थे –

१. नेताजी सुभाषचंद्र बोस, उनकी आजाद हिंद फौज और उनके प्रति भारतीय सैनिकों का आकर्षण.

२. ब्रिटिश सेना में हुए विद्रोह.

इनके कारण अंग्रेजों की सत्ता भारत में आमूलचूल हिल गई थी.

“मैंने फिर एटली से पूछा ‘गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन का अंग्रेजों के जाने में कितना योगदान है?’  इस पर मुस्कुराते हुए एटली कहते हैं, “नगण्य’ !”

न्यायमूर्ति चक्रवर्ती जी का यह अनुभव अपने आप में बहुत कुछ कह देता है.

जनरल वीके सिंह ने अपनी पुस्तक, ‘The contribution of the Indian Armed forces to the freedom movement’ में लिखा है, “Though the mutiny at Jubbulpore was at that time not considered as ‘serious’ as the naval mutiny, its repercussions were immense. The earlier revolts in the RIAF and RIN, though more widespread and larger in scale, did not really worry the British authorities, because the Indian Army, on which they depended for meeting external and internal threats, was still considered reliable, having proved its fidelity during World War II. The mutiny at Jubbulpore was the first major uprising in the Indian Army during or after the war. This set alarm bells ringing from Delhi to London, and doubts began to be expressed on the steadfastness of the Indian Army. Ultimately, it forced Britain to reach a settlement with the political parties and quit India.” (Page 139-140)

निकोलस मेनसर्ग (Philip Nicholas Seton Mansergh : १९१० – १९९१) यह प्रख्यात ब्रिटिश इतिहासकार थे. कॉमनवैल्थ के कारण प्रारंभिक दिनों में उनका भारत से काफी संबंध आया. इन्होने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किये. उनके अनुसार ब्रिटिश भारत छोड़ कर गए, क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया कि सेना की निष्ठा अब ब्रिटिश हुकूमत पर नहीं बची है. उसमें से भी थल सेना में उपजा असंतोष उनके लिये ज्यादा चिंताजनक था, बनिस्बत नौसेना और वायुसेना के असंतोष से. उनके शब्द हैं, “It is pertinent to remember that one of the compelling reasons for the departure of the British from India was the apprehension that the loyalty of Indian armed forces was doubtful. Due to obvious reason, the staunchness of the Army was more worrisome than that of the other two Services.” इसीलिये ५ सितंबर, १९४६ को ब्रिटिश आर्मी चीफ जनरल आचिनलेक ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा उसमें जबलपुर के असंतोष का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं – “The importance of keeping the Indian Army steady is emphasised. It is the one disciplined force in which communal interests are subordinated to duty, and on it depends the stability of the country.  The steadiness of the RIN and the RIAF is of lesser import but any general disaffection in them is likely seriously to affect the reliability of the army.”

दिल्ली में इंदिरा गांधी सेंटर फॉर फ्रीडम स्ट्रगल स्टडीज है. इसके डायरेक्टर हैं – फ्रोफेसर कपिल कुमार. वे कहते हैं, “The 1946 revolt in the Royal Navy by Indians was a major reason why India got Independence, apart from the desertions to Netaji’s Azad Hind Fauj or the Indian National Army (INA). The British got unnerved as they could no longer depend on their armed forces in India. This was the main reason why they decided to quit.”

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों को भारत का सहयोग चाहिये था. ब्रिटिश सरकार को लगा कि भारतीयों के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में कुछ करने की आवश्यकता है. इसलिये ब्रिटन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने, मार्च १९४२ में युद्ध मंत्रीमंडल के मदस्य सर स्टेफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा. यह क्रिप्स मिशन कहलाता है.

क्रिप्स ने भारतीय नेताओं को यह प्रस्ताव दिया कि युद्ध के पश्चात निर्वाचित संविधान सभा का गठन किया जाएगा और भारत को ब्रिटन के उपनिवेश का दर्जा दिया जाएगा. प्रांतों को नया संविधान स्वीकार या अलग संविधान निर्माण की स्वतंत्रता होगी.

अर्थात विश्व युद्ध के चलते, कठिन परिस्थिति में भी ब्रिटिश सत्ता, भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं थी.

यही सर स्टेफोर्ड क्रिप्स, बाद में ब्रिटेन की संसद, अर्थात ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में चर्चा में भाग लेते हुए कहते हैं, “भारतीय सेना ने हमारे अधिकारियों की बात सुनना बंद कर दिया है.” ब्रिटिश संसद में बोले गए उनके शब्द हैं, “…The Indian Army in India is not obeying the British officers. We have recruited our workers for the war; they have been demobilised after the war. They are required to repair the factories damaged by Hitler’s bombers. Moreover, they want to join their kith and kin after five and a half years of separation. Their kith and kin also want to join them. In these conditions if we have to rule India for a long time, we have to keep a permanent British army for a long time in a vast country of four hundred million. We have no such army and money….”

कांग्रेस ने यह क्रिप्स मिशन ठुकराया और ९ अगस्त १९४२ से ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन प्रारंभ किया. यह आंदोलन प्रभावी रहा. किंतु ज्यादा चल नहीं पाया. इस आंदोलन के बाद १९४७ में भारत स्वतंत्र होने तक कांग्रेस ने कोई बड़ा आंदोलन नहीं छेड़ा था.

अर्थात ब्रिटिश सत्ता, जो भारत को सहज रूप से नहीं छोड़ना चाहती थी, वो अभी कम से कम ५-१० वर्ष, किसी न किसी रूप से भारत में रहने की सोच रही थी. उस पर कांग्रेस का या अन्य किसी आंदोलन का दबाव भी नहीं था.

तो फिर ब्रिटिश सत्ता ने भारत छोड़ने का निर्णय क्यों लिया ?

जनरल वी. के. सिंह ने अपने पुस्तक में इसे स्पष्ट किया है. वे लिखते हैं, “Had the Indian armed forces remained staunch, there is little doubt that British rule would have continued for at least another 10 to 15 years. The nationalistic feeling that had entered the heart of the Indian soldier was one of the most important factors in the British decision to grant complete independence to India, and also to advance the date from June 1948 to August 1947.”

हम घटनाक्रम देखेंगे तो बातें स्पष्ट होती हैं.

जनवरी १९४६ में वायु सेना के जवान हड़ताल पर जाते हैं, आंदोलन करते हैं. २३ फरवरी १९४६ को मुंबई में नौसेना का आंदोलन होता है. फिर तुरंत २७ फरवरी को जबलपुर में थल सेना के सिग्नल्स कोर में आंदोलन होता है.

इसको देखते हुए आर्मी चीफ आचिनलेक, ५ सितंबर, १९४६ को प्रधानमंत्री एटली को चिट्ठी लिखते हैं कि, ब्रिटिश हुकूमत को जल्द से जल्द भारत छोड़ना चाहिये. भारत और ब्रिटेन की ब्रिटिश सत्ता को यह विश्वास हो जाता है कि भारत की सेना के सभी अंगों (नौसेना, थलसेना, वायुसेना) के जवानों की निष्ठा अब ब्रिटिश सत्ता के प्रति नहीं रही है. उनके मन में सुभाष चंद्र बोस का आकर्षण कायम रहा है.

इसलिये १८ फरवरी, १९४७ को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली, लंदन में हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा करते हैं कि ‘ब्रिटेन भारत को स्वतंत्रता देने जा रहा है’.

और अगले माह, अर्थात २० मार्च, १९४७ को इस सत्ता हस्तांतरण को सुलभ बनाने के लिये लॉर्ड माउंट बेटन दिल्ली पहुंचते हैं. भारत पहुंचने के बाद, जनरल आचिनलेक से चर्चा कर के वे निर्णय लेते हैं कि भारत को सत्ता का हस्तांतरण, पहले से तय तिथि, अगस्त १९४८ के बजाय एक वर्ष पहले, अर्थात् अगस्त १९४७ को करना ठीक रहेगा. और फिर १५ अगस्त, १९४७ यह तिथि तय होती है.

अर्थात् भारतीय सैनिकों में जगे ‘स्व’ के कारण, अंग्रेजों को गिरते – भागते, भारत छोड़ने पर विवश होना पड़ा..!

इस लघु लेखमाला की संदर्भ सूची –

  1. ‘The contribution of the Indian Armed Forces to the Freedom Movement’ – Maj. Gen. V. K. Singh
  2. ‘Constitutional Relations between British and India : The Transfer of Power 1942 – 47. – Nicholas Mansergh
  3. ‘RIN Mutiny 1946 : Reference and Guide for All.’ – Biswanath Bose
  4. ‘Mutiny of Innocents’ – B. C. Datta
  5. ‘Transfer of Power’ – V. P. Menon
  6. ‘Revisiting Talwar’ – Dipak Kumar Das
  7. ‘The Army of Occupation’ – Kusum Nair
  8. ‘How Gandhi, Patel and Nehru colluded with Brits to suppress Naval Mutiny of 1946’ – Saraswati Sarkar, Shanmukh and Dikgaj
  9. ‘Declassify files on 40s Mutinies, rewrite History’ – Navtan Kumar (An article in Sunday Guardian on 18th October, 2015).
  10. ‘Fidelity and Honour’ – Lt. Gen S. L. Menezes
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