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क्यों आवश्यक है संस्कृत…!

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हाल ही में शिक्षा संबंधी संगठनों के कुछ प्रतिनिधियों ने गुजरात के शिक्षा मंत्री से अनुरोध किया कि वे प्रदेश में संस्कृत की अनिवार्य पढ़ाई शुरू करवाएं. केवल गुजरात ही क्यों पूरे भारत में संस्कृत अनिवार्य रूप से पढ़ाई जानी चाहिए. आज जब सारी दुनिया संस्कृत के महत्व को समझ रही है, उसका गुणगान कर रही है, तो हमें भी अपनी प्राचीन भाषा पर गौरवान्वित होते हुए शिक्षा में संस्कृत को महत्व देना चाहिए.

दुनिया भर में संस्कृत भाषा का बोलबाला है. इसे हम कई तरीके से समझ सकते हैं. ज़ी टीवी की एक रिपोर्ट में प्राचीन, समृद्ध, व्याकरणसम्मत और वैज्ञानिक भाषा से जुड़ने की अपील भी की थी. रिपोर्ट के अनुसार –

– संयुक्त राष्ट्र संगठन के अनुसार दुनिया भर में बोली जाने वाली करीब 97% भाषाएं संस्कृत से प्रभावित हैं.

– कंप्यूटर द्वारा गणित के सवालों को हल करने वाली विधि एल्गोरिथ्म संस्कृत में बने हैं, न कि अंग्रेजी में.

– संस्कृत में दुनिया की किसी भी भाषा से ज्यादा शब्द हैं.

– इतने सारे शब्दों के बावजूद किसी और भाषा के मुकाबले संस्कृत में सबसे कम शब्दों में एक वाक्य पूरा हो जाता है.

– फोर्ब्स मैग्जीन ने जुलाई 1987 में संस्कृत को कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए सबसे बेहतर भाषा माना था.

– अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अनुसार संस्कृत, धरती पर बोली जाने वाली सबसे स्पष्ट भाषा है. जिसकी वजह से संस्कृत कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए सबसे कारगर है.

– नासा के पास संस्कृत के ताड़पत्रों पर लिखी 60000 पांडुलिपियां हैं, जिन पर नासा रिसर्च कर रहा है.

– नासा के वैज्ञानिक ऐसे नई जेनरेशन कंप्यूटर तैयार कर रहे हैं जो संस्कृत भाषा पर आधारित हैं और 2034 तक बनकर तैयार हो जाएंगे.

– शोध अध्ययनों ने साबित किया है कि संस्कृत सीखने से दिमाग तेज होता है और याद रखने की शक्ति भी बढ़ जाती है.

– इसीलिए आयरलैंड और लंदन के कई स्कूलों में संस्कृत को अनिवार्य विषय बना दिया गया है.

– अमेरिका की इंटरनेशनल वैदिक हिन्दू यूनिवर्सिटी के अनुसार, संस्कृत अकेली ऐसी भाषा है जिसे बोलने में जीभ की सभी मांसपेशियों का इस्तेमाल होता है. जिसकी वजह से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है.

– इस वक्त दुनिया के 17 से ज्यादा देशों की कम से कम एक यूनिवर्सिटी में तकनीकी शिक्षा के कोर्सेज में संस्कृत पढ़ाई जाती है.

सारी दुनिया संस्कृत के महत्व को समझती है और उसका गुणगान भी करती है. हमें विदेशी भाषाओं की आंधी में अपनी प्राचीन भाषा को कभी भूलना नहीं चाहिए.

डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने भी संस्कृत के संबंध में बहुत अच्छा विश्लेषण किया है. संस्कृत की अनिवार्य पढ़ाई शुरू करवाने के बारे में उनका कहना है कि भारत के हर तर्कशील नागरिक को सारे भारत के लिए यह मांग करनी चाहिए क्योंकि दुनिया में संस्कृत जैसी वैज्ञानिक, व्याकरणसम्मत और समृद्ध भाषा नहीं है. यह दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा तो है ही, शब्द भंडार इतना बड़ा है कि उसके मुकाबले दुनिया की समस्त भाषाओं का संपूर्ण शब्द भंडार भी छोटा है.

अमेरिकी संस्था नासा का एक अनुमान बताता है कि संस्कृत चाहे तो 102 अरब से भी ज्यादा शब्दों का शब्द कोश जारी कर सकती है क्योंकि उसकी धातुओं, लकार, कृदंत और पर्यायवाची शब्दों से लाखों नए शब्दों का निर्माण हो सकता है.

संस्कृत की बड़ी खूबी है कि उसकी लिपि बेहद वैज्ञानिक और गणित के सूत्रों की तरह है. जैसा बोलना, वैसा लिखना और जैसा दिखना, वैसा बोलना. अंग्रेजी और फ्रैंच की तरह नहीं.

संस्कृत वास्तव में विश्व भाषा है. इसने दर्जनों एशियाई और यूरोपीय भाषाओं को समृद्ध किया है. संस्कृत को किसी धर्म विशेष से जोड़ना गलत है.

भारत में बच्चों को संस्कृत, उनकी मातृभाषा और राष्ट्र भाषा हिन्दी स्कूल में 11वीं कक्षा तक अवश्य पढ़ानी चाहिए. अंग्रेजी या अन्य कोई भी विदेशी भाषा सीखने के लिए बीए के तीन साल बहुत हो सकते हैं.

हमारे दैनंदिन जीवन में संस्कृत केवल कर्मकांड की भाषा बनकर न रह जाए, विवाह पद्धति और जन्म-मरण में मंत्रोच्चार की भाषा तक सीमित न रह जाए, इसके लिए हम सभी को संकल्पबद्ध होना होगा. वसुधैव कुटुंबकम् बोलने वाला भारतीय संस्कृति में पूरी पृथ्वी को कुटुम्ब मानता है. सर्व के कल्याण की भावना रखता है. भारतीय ज्ञान परंपरा को सदियों से संचित रखने वाली संस्कृत भाषा से हम पूरे मन से जुड़ेंगे तो उस अथाह परपंरा को आगे बढ़ा पाएंगे. और विश्व गुरु के सपने को साकार होते हुए देखेंगे.

रजनी नागपाल

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