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बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय का शूल…..

डॉ. आयुष गुप्ता

भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) एवं आयुर्विज्ञान (मेडिकल साइंस) का अध्ययन अध्यापन अपनी मातृभाषा में कराने का विचार केवल सांकेतिक नहीं है. इस महत्वपूर्ण सोच के पीछे भाषा सम्बन्धी पूरी एक दार्शनिक, सामाजिक अवधारणा जुडी है. भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, अपितु संस्कृति की रक्षक भी है. भाषा का महत्व केवल इसी दृष्टिकोण से स्पष्ट हो जाता है कि भाषा अकेले नहीं मरती, बल्कि पूरी की पूरी अथवा आंशिक सामाजिक परिपाटियों को अपने साथ ले जाती है. भाषा का महत्वपूर्ण पक्ष देखा जाए तो भाषा सभ्यता एवं संस्कृति की वाहक भी है.

मानव मस्तिष्क में सांकेतिक शब्दों एवं पदार्थों का तारतम्य भाषा के माध्यम से ही होता है. किसी विषय को मानव मन में गहराई तक छोड़ने या दीर्घकाल तक पिरोने का कार्य वही भाषा कर सकती है, जिसमें मानव सहज हो. किसी नवीन अथवा विदेशी भाषा के माध्यम से तकनीकी अथवा प्रयोगपरक ज्ञान को मानव मस्तिष्क में उस तीव्रता से प्रवेश कराना उतना सरल नहीं, जितना मातृभाषा के माध्यम से हो सकता है. यह कथन आधारहीन नहीं, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है.

मानव मस्तिष्क की ग्राह्य क्षमता के अनुसार यदि किसी तकनीकी विषय को विदेशी भाषा अथवा नवीन भाषा के माध्यम से सिखाया जाता है, तो मस्तिष्क को तथ्य सीखने के अतिरिक्त भाषा को समझने में भी कुछ शक्ति व्यय करनी होती है. इस अतिरिक्त शक्ति के कारण तथ्य उतनी प्रबलता से व्यक्ति के मस्तिष्क में उस चित्र को अंकित नहीं कर पाता, जितनी प्रबलता एवं तीव्रता से मातृभाषा में कही गयी बात मानव मन में चित्र खींच देती है.

भाषा सीखने के इस मनोविज्ञान को शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय महासचिव अतुल कोठारी ने भी अनेक बार आभियांत्रिकी (इंजीनिरिंग) एवं आयुर्विज्ञान (मेडिकल) का अध्ययन मातृभाषा में ही कराने का आग्रह अनेक पत्रों, संगोष्ठियों एवं भाषणों के माध्यम से किया है. अतुल भाई के शब्दों में “विदेशी भाषाओं में दिया गया तकनीकी ज्ञान, भारतीय आवश्यकताओं एवं महत्वाकांक्षाओं को पुष्ट करने में सक्षम नहीं है.”

मां, मातृभाषा एवं मातृभूमि का कोई विकल्प नहीं – इस ध्येय के साथ-साथ, भाषा की वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रविधि के अनुरूप भी विश्लेषण करने पर यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि आभियांत्रिकी एवं आयुर्विज्ञान का अध्ययन अध्यापन मातृभाषा में कराने का निर्णय ज्ञान एवं विज्ञान में नवीन संभावनाओं को स्थान देगा.

मातृभाषा के सम्मान एवं संरक्षण हेतु आज विशिष्ट दिवस भी है. 21 फरवरी, 1952 को ढाका विश्वविद्यालय एवं ढाका चिकित्सा महाविद्यालय के अनेक छात्रों ने शहीद मीनार स्थल पर ढाका उच्च न्यायालय के बाहर बांग्ला को राष्ट्र भाषा घोषित करने हेतु आंदोलन किया था. इस आंदोलन में अनेक छात्र पुलिस की गोली का शिकार हुए. इस घटना को ध्यान में रखकर 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा, 17 नवम्बर, 1999 को यूनेस्को द्वारा की गयी.

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2008 में इसे स्वीकृति प्रदान की. अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने के पीछे लक्ष्य यह रहा है कि सम्पूर्ण विश्व मिलकर सांस्कृतिक एवं भाषिक विविधताओं को पोषित एवं पल्लवित करे, जिससे विश्व में बहुभाषिकता संवर्धित हो.

(लेखक – सहायक प्राध्यापक, तिलकामांझी विश्वविद्यालय भागलपुर, बिहार)

 

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