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हिन्दू दर्शन भारतीय है और वैश्विक भी : डॉ. कृष्ण गोपाल

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हम जानते हैं कि सभी देश और हर एक समाज का एक विशिष्ट ‘स्वाभाविक-स्वभाव’ होता है. उस देश व समाज की वह एक विशिष्ट पहचान भी होती है. उस विशिष्ट पहचान और स्वभाव को लेकर के ही वह देश विश्व में जीता है. वही विशेष स्वभाव और उसकी वह परम्परा उस देश और समाज की आत्मा के रूप में और वही उसकी नियति के रूप में भी रहता है. एक तरह से कहा जाये तो उस समाज और राष्ट्र की विश्व के लिये देन भी वही हो सकती है.

हमारे देश की भी हजारों वर्ष पुरानी एक विशिष्ट पहचान है और वह पहचान ‘हिन्दुत्व’ है और यदि उस ‘हिन्दुत्व’ को ही हम निकाल देते हैं या छोड़ देते हैं तो यह देश केवल एक भूखण्ड मात्र रह जायेगा, भौतिक वस्तुओं का संग्रह मात्र. इसीलिये, जब हम ‘हिन्दुत्व’ कहते हैं तब यह हमारे देश का, हमारे सारे समाज का तथा हजारों वर्षों की हमारी महान परंपरा का प्रतीक रूप बन जाता है. यही उसकी अन्तर-आत्मा भी है.

हमारा भारतीय दर्शन, भारतीय साहित्य, भारतीय कला, भारत का संगीत, भारत के शास्त्र, भारत के नाट्य, भारत की परंपरायें, भारत के पर्व, भारत के उत्सव जो भी कुछ हम देखेंगे या जानेंगे और जहाँ भी भारतीय विद्या या परम्परा को लेकर लोग खड़े हैं, कहीं न कहीं वे हिन्दुत्व से ही अभिप्रेरित हैं. वही इस ‘राष्ट्र’ की मूल और मौलिक प्रस्तुति है और उसकी आत्मा के रूप में भी वही स्थित है.

हिन्दू-दर्शन, हिन्दुत्व, हिन्दू-संस्कृति, हिन्दू-धर्म और हिन्दू-राष्ट्र इन सभी शब्दों में थोड़ा-थोड़ा, अन्तर है लेकिन ये सभी बातें भिन्न हैं और अपना अलग-अलग अस्तित्व रखती हैं.

दर्शन, संस्कृति और सभ्यता

हमारे देश में हमने स्वीकार किया है कि हमारा जो दर्शन है वह ‘हिन्दू-दर्शन’ है. यह ‘हिन्दू-दर्शन’ दसियों हजार वर्षों से, वैदिक ऋषियों और औपनिषदिक ऋषियों से हमारे पास उतर कर आया है. उन महापुरुषों ने दिव्यदृष्टि से, साधना की उच्चावस्था में उस दर्शन को साक्षात् किया है. हम लोग उसको मानते हैं और स्वीकार करते हैं. वह दर्शन हिन्दू-दर्शन है. उस दर्शन को श्रद्धा से, भक्ति से तथा पवित्र भाव से अपने अन्दर संजोकर के जो रखता चला आ रहा है वह हिन्दू समाज ही है. उस भाव के कारण से ही वह एक विशिष्ट प्रकार से विचार करता है, उस दर्शन के कारण से वह समाज-जीवन के भिन्न-भिन्न विषयों पर एक विशिष्ट प्रकार से चिन्तन करता है, अर्थात् वह हिन्दुत्व का भाव उसके मन के अन्दर गहरा स्थित रहता है. इस भाव के प्रकाश में जब वह अपना जीवन जीता है, इस भाव के कारण से जीवन के भिन्न-भिन्न आयामों में वह अपनी प्रस्तुति करता है, जीवन के अंग, उपांग में इस दर्शन को ही दर्शाता है, जीवन के किसी भी कार्य में इसी दर्शन की वह अभिव्यक्ति करता है तब यह दर्शन ‘हिन्दू-संस्कृति’ के रूप में प्रकट होता है.

सभ्यता और संस्कृति में थोड़ा सा अन्तर है. कई बार इन दोनों शब्दों में लोगों को भ्रम होने की भी काफी संभावना बनी रहती है. सभ्यता, मुख्यतः एक भौतिक अवस्था है तथा समाज के जीवन का बाह्य प्रकटीकरण है. कभी-कभी बहुत सभ्य दिखने वाले व्यक्ति भी आवश्यक नहीं कि वे सुसंस्कृत होंगे ही. भारत की परंपरा में ऐसे बहुत लोग रहते हैं जो देखने से लगेगा कि आधुनिक सभ्यता से दूर ही हैं किन्तु सांस्कृतिक दृष्टि से वे बहुत श्रेष्ठ हो सकते हैं. स्थूल रूप से कहें तो सभ्यता के बड़े आधार के रूप में लौकिक सुविधायें, विज्ञान के आविष्कार तथा समाज का आर्थिक पक्ष प्रमुख रहता है. संक्षेप में कहें तो सभ्यता, अर्थ एवं आर्थिक व्यवस्थाओं को केन्द्र मानकर के उसके चारों ओर घूमती है. जैसे-जैसे विज्ञान बढ़ता है, नये-नये आविष्कार होते चलते हैं, अर्थ भी बढ़ता है; और जब अर्थ आता है तब जीवन में सुविधायें और साधन भी बढ़ते जाते हैं तथा सभ्यता अपने नये रूप में विकसित होती जाती है. उदाहरण स्वरूप पहले यातायात के रूप में सड़कें कच्ची होती थीं, बाद में सड़कें पक्की हो गईं और अब अच्छे सुन्दर राजमार्ग बन गये हैं. यह सभ्यता का विकास है. हजारों वर्षों पूर्व मकान का स्वरूप झोपड़ी का था, मकान खपरैल का बना, विज्ञान ने प्रगति की और आवास आर.सी.सी. का बन गया और आगे बड़ा बंगला बन गया. पहले लोग भूमि पर बैठकर खाते थे. अब मेज पर बैठकर खाते हैं, खड़े होकर भी खाते हैं. यह सभ्यता की यात्रा है. पूर्वकाल से लोग पत्तल पर भोजन करते थे, बाद में मिट्टी के बर्तन उपयोग में आये, पीतल, कांसे के पात्र आये, अब चीनी मिट्टी के पात्र हैं, यह सभ्यता का विकास है. पहले लोग पैदल यात्रा करते थे, फिर घोड़े, हाथी पर चलने लगे, बैलगाड़ी आई, सायकिल, मोटर सायकिल, कार, मोटर, रेलगाड़ी, हवाई जहाज का युग आया. वस्त्रों का पहनावा, विद्यालयों का स्वरूप, खेलों तथा मनोरंजन के साधन आदि विज्ञान और अर्थ के साथ परिवर्तित होते चलते हैं. यह विज्ञान के अनुसंधान और अर्थ की यात्रा है. धीरे-धीरे विज्ञान और आविष्कार के चारों ओर घूमने वाली यह सभ्यता है. अर्थात्, सभ्यता वह है जो बाहर-बाहर से अपना आवरण संवारती है. बाह्य परिदृश्य को सजाती है, सुविधायें और व्यवस्थायें बनाती है.

संस्कृति दूसरी और कुछ गहरी बात है. संस्कृति ऐसी बात है जो मनुष्य के जीवन में अन्तर्निहित है. संस्कृति जीवन का वह रस है जो अंग-अंग में बहुत गहराई से व्याप्त हो जाता है. संस्कृति वह है जो जीवन की समस्त बातों को प्रभावित करती है. संस्कृति वह है जो हजारों सालों के संचयन से बनती है और प्रकट होती है. हजारों वर्षों के विचार और प्रयत्नों से समाज में वह अपना स्थान बनाती है.

संस्कृति का केन्द्र बिन्दु ‘दर्शन’ रहता है. उदाहरण स्वरूप- भोजन को देखने की दृष्टि संस्कृति तय करती है. जैसे ईश्वर के प्रसाद रूप में भोजन है, यह मान्यता संस्कृति द्वारा प्रदत्त है. भोजन (अन्न) स्वयं ब्रह्म रूप है. उचित रीति से यह भोजन आया है क्या ? भोजन व्यर्थ नष्ट नहीं करना. पहले भूखे को खिलाकर तब भोजन करना. स्वयं अकेले-अकेले भोजन नहीं करना आदि-आदि. भोजन के प्रति यह जो दृष्टिकोण और भाव है, वह हमारी ‘संस्कृति’ ने निश्चित किया है. जीवन के प्रति यह ‘आध्यात्मिक’ दर्शन जब समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रकट होता है तब उसको हम ‘संस्कृति’ कहते हैं.

ध्यान में रखने वाली बात यह है कि- हजारों साल में बनने वाली यह ‘संस्कृति’ तुरन्त नष्ट भी नहीं होती, वह फूल में सुगंध की तरह व्याप्त रहती है. जीवन की हर एक बात के अन्दर वह प्रकट हो जाती है, अभिव्यक्त होती है. दूध में मक्खन की तरह वह घुली-मिली रहती है किन्तु बाहर से दिखेगी नहीं. जो सम्पूर्ण जीवन में अन्दर व्याप्त है वह ‘संस्कृति’ है.

हिन्दू समाज ने स्वीकार किया है कि ‘संस्कृति’ उसकी आत्मा का श्रंगार है. वहीं, सभ्यता उसके शरीर की सजावट का आयोजन मात्र ही है. इसी कारण से ‘संस्कृति’ वह ‘संस्कार’ है जो जन्म-जन्मान्तर तक हमारे पीछे-पीछे और आगे-आगे चलता है, मरने के बाद भी छूटता नहीं. हम कहते हैं कि वह पूर्व जन्म के संस्कार लेकर पैदा हुआ है अर्थात् ‘संस्कृति’ वहाँ अवतरित होती है. हर पीढ़ी अपनी ‘संस्कृति’ को नई पीढ़ी को उपहार परंपरा के रूप में प्रदान कर आगे बढ़ती जाती है. हमारे स्मरण में यह बना रहे कि हमारी ‘संस्कृति’ का आधार हमारा ‘आध्यात्मिक-दर्शन’ ही है.

हिन्दुत्व की यात्रा में ‘मैं’ और ‘हम’ की हमारी दार्शनिक संकल्पना

हम जानते हैं कि ‘मैं’ तथा ‘हम’ से समाज बनता है. प्रत्येक समाज में इन दोनों के प्रति दृष्टिकोण क्या रहता है वह (चिन्तन और दर्शन) उस समाज का सोचने, विचारने एवं व्यवहार करने की दिशा को निश्चित करता है. अतः हमारे समाज में इन दोनों शब्दों पर विचार करने का तरीका क्या रहा है, यह ध्यान में रखना आवश्यक है.

हमारे यहाँ बार-बार ‘मैं’ का चिन्तन हुआ और इस पर दृष्टि अवश्य गयी कि ‘मैं’ कौन हूँ और ‘मैं’ कहाँ से आया हूँ? मैं कहाँ जाऊँगा और मेरा यहाँ आने का उद्देश्य क्या है? ‘मेरा’ ईश्वर से सम्बन्ध क्या है? मेरा यहाँ जीव-जगत और प्रकृति से सम्बन्ध क्या है? ये विषय चर्चा में सदैव बने रहे. इसलिये ऋषि जब ‘मैं’ के ऊपर चर्चा करते हैं तब उनका दर्शन आध्यात्मिक भाव वाला ही रहता है. जब भी ‘मैं’ का प्रश्न आया तो ऋषियों ने सदैव उस ‘मैं’ को केवल एक ही केन्द्र पर केन्द्रित करके विचार किया कि ‘मैं’ माने ईश्वर का एक अंश, ‘मैं’ अर्थात् चैतन्य का अंश, ‘मैं’ अर्थात् उस परमपिता परमेश्वर का अंश. इस ‘मैं’ अर्थात् ईश्वरांश को समझना तथा ईश्वरीय तत्व को अनुभूत करना यहाँ के दर्शन का प्रमुख तत्व रहा. इसके अलावा वे ‘मैं’ के बारे में और कुछ नहीं बोले.

भगवान राम जब ऋषि वसिष्ठ के पास जाते हैं और दरवाजा खटखटाते हैं तो अन्दर से आवाज आती है – कौन? राम बोलते हैं – ‘मैं’ यही तो जानने आया हूँ कि मैं कौन हूँ. इस प्रकार ‘वैदिक-दर्शन’ ने ‘मैं’ की अलग से कोई परिभाषा न करके ‘मैं’ को एक इश्वरीय अंश मानकर सर्वत्र ईश्वरीय भाव का ‘एकात्म बोध’ कराया. यह ‘हिन्दू-दर्शन’ का बड़ा आधार है.

दूसरा शब्द है-‘हम’. हमारे ऋषि इस बात पर सदैव एकमत हैं कि ‘हम’ माने अविभाज्य ‘एक’. ‘हम’ माने सभी प्रकार के ‘एकत्व’ का भाव और किसी भी प्रकार के जो बाह्य विभाजन थे, उनको हमारे ऋषियों ने और आदर्श पुरुषों ने हमेशा छोटा, तुच्छ, निरर्थक और हेय समझा और उन सभी विभाजनों एवं विभेदों को सिद्धान्ततः नकार दिया. समाज के अन्दर दिखने वाला सम्पन्न, विपन्न का भेद, ज्ञानी, अज्ञानी का भेद, राजा या रंक का भेद, ब्राह्मण-शूद्र का भेद, भाषा-प्रान्त या राज्य आदि सारे के सारे ऊपर से दिखने वाले भेद थे, लेकिन ‘हम’ अविभाज्य ‘अध्यात्म-दर्शन’ था. जब भी ‘हम’ का प्रयोग हुआ वह ‘एकात्म’ का ही एक रूप था. इसलिये ‘हिन्दू-दर्शन’ को देने वाले हमारे उन ऋषियों ने इस सारी पृथ्वी को, भूण्मडल को, विश्व को, सम्पूर्ण जगत को एक इकाई ‘हम’ के रूप में ही माना. ये सभी भौगोलिक इकाइयाँ ‘हम’ का ही विस्तारित रूप मानी गईं. ‘हम’ सदैव अविभाज्य था. वह चाहे ‘विश्व’ था, ‘पृथ्वी’ थी या ‘जगत’ था. हमने कहीं ‘सर्वभूतेषु’ कहा ‘सर्वजना’ कहा अथवा ‘सर्वे’ कहा, वह अविभाज्य ‘हम’ का ही एक विराट् रूप माना गया. आश्चर्य की बात यह थी कि हमारे ऋषियों ने ‘हम’ कौन हैं इसको भी कोई अलग से विशिष्ट संज्ञा देने की आवश्यकता नहीं समझी. उन्होंने जब भी चर्चा की तो ‘सबकी’ चर्चा की. विभाजन करके अपने छोटे-छोटे समूहों की चर्चा उन्होंने कभी नहीं की. इस प्रकार, एक विशिष्ट शैली से विकसित हुए इस ‘वैदिक-दर्शन’ के बारे में हम कुछ मौलिक बिन्दुओं पर आगे बढ़ते हैं.

हिन्दू दर्शन के चार मौलिक आधार बिन्दु

जिसे ‘वैदिक-दर्शन’ कहा जाता है, उसकी आधारभूत विशेषतायें क्या हैं? उसका आधारभूत धरातल क्या है? यह जानना एक महत्वपूर्ण बात है. इसके बारे में हम कुछ मुख्य बिन्दु आपके सामने रखते हैं. हम समझते हैं कि वैदिक दर्शन एवं इस देश के सनातन दर्शन का वह प्राण-स्थल है.

क्रमांक- 1. सर्वव्यापी ईश्वर की हिन्दू दृष्टि:  ऋषियों ने कहा कि सम्पूर्ण जगत में एक ही चैतन्य है, एक ही परमात्मा है, एक ही ईश्वर है और उस सर्वव्यापी ईश्वर से, सम्पूर्ण जगत व्याप्त है. यह उनका एक मौलिक सिद्धान्त था और यह विश्व को दिये गये एक अभूतपूर्व, मौलिक दर्शन का आविष्कार था. विश्व को ‘एकात्म-दृष्टि’  देने वाले इस अभिनव दर्शन को वे अपने स्वयं के अन्तःकरण से अनुभूत एवं आत्मसमृद्ध कर रहे थे. यजुर्वेद की -‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्यां जगत’, (इश्वास्योपनिषद-1), जैसी ऋचाओं के द्वारा तथा ऐसी ही बहुत सारी अन्य ऋचाओं के द्वारा उन्होंने विश्व भर में व्याप्त ईश्वरीय भाव के साथ-साथ एक ‘आध्यात्मिक-एकात्म-आधार’ को ढूँढ़ने का प्रयास किया. भगवान कृष्ण गीता में उसी को कहते हैं – ‘ईश्वरः सर्वभूतानां.’ अथात् ‘सभी प्राणियों के अन्दर मैं ईश्वर रूप में उपस्थित हूँ. वह ब्रह्म अथवा ईश्वर एक होते हुए भी सर्वत्र तथा सभी के अन्दर विराजमान है. यह हिन्दुओं की एक मौलिक तथा अभूतपूर्व दृष्टि रही. यही दृष्टि सम्पूर्ण जगत की ‘एकात्मता’ का आधार भी बनी. सैकड़ों देवी-देवताओं की पूजा करनेवाला हिन्दू इस मौलिक सिद्धान्त को जानता है कि इन देवी-देवताओं की आराधना करते-करते वह उस एक ब्रह्म के साथ एक रूप हो सके. यहाँ यह बात ध्यान में रखना आवश्यक है कि सेमेटिक पंथों का ईश्वर एक होते हुए भी वह केवल सातवें आसमान पर रहता है. वह धरती पर कभी नहीं आता तथा उसके साथ साझेदारी करना अर्थात् अपने आक्काह या गॉड को मानना पाप (कुफ्र) है, यह ईश निन्दा है और इसकी सजा मृत्युदण्ड है.

क्रमांक-2. सभी के अन्दर वह ईश्वरांश समान है: हमारे ऋषियों द्वारा अनुभूत, हम सबके अन्दर जो ईश्वर का अंश है, वह छोटा या बड़ा नहीं है, वह सभी के अन्दर समान है, यह दूसरी दृष्टि है जो वे हमको देते हैं. हिन्दुओं के सभी ग्रन्थों में हम इसको विस्तार से पाते हैं. ऋग्वेद में जब वह ऋषि कहता है- ‘ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदो अमध्यमासो’ (ऋग्वेद-5.58.6) तब वैदिक ऋषि स्पष्ट करता है कि – ‘हम में से कोई भी छोटा नहीं है और कोई भी बड़ा नहीं है. यहाँ तक कि कोई बीच का भी नहीं है.’ अर्थात् उन ऋषियों ने हम सभी को एक ‘समदृष्टि’ दी है. इसी ‘समदृष्टि’ के कारण सभी समान हो गये. भारत के सभी धार्मिक ग्रन्थों ने इस ‘समदृष्टि’ को बहुमान दिया है. गीता भी वही बताती है और कहती है- “समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठतं परमेश्वरं” (गीता 13.26) अर्थात् ‘सभी प्राणियों में ‘मैं’ (ईश्वर रूप में) समान रूप से हूँ.’ यह दूसरा बड़ा सिद्धान्त था जो सनातन धर्म के ऋषियों ने हमको प्रदान किया.

क्रमांक 3. सर्वमांगल्य का वैश्विक संकल्प: ऋषियों द्वारा प्रदत्त अध्यात्म की इस समदृष्टि ने विश्व के सभी प्रकार के विविध स्वभावों वाले प्राणियों में एक समान ईश्वरीय भाव को देखा था इस कारण, अनेक भाव दर्शन इसमें से प्रकट होते जाते हैं और जो इसके भावों का विस्तार करते हुए आगे बढ़ते हैं. यह दर्शन हमको समझाता है कि हम सभी आपस में किसी भी प्रकार का वैर (द्वेष) न करें. अर्थात्-‘निर्वैर: सर्वभूतेषु’, (गीता-11.55) अर्थात् सभी प्राणियों के साथ हमको ‘निर्वैरी’ होना चाहिये. यही भाव दर्शन आगे बढ़ता है और बताता है कि सभी जीवों के हितों के लिये कार्य में लगे रहिये – ‘सर्वभूत हिते रताः (गीता-12.4)- इसी भाव को हम बहु प्रचलित श्लोक में बार-बार दोहराते हैं- सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः. सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्.. अर्थात् ‘जगत में जो भी प्राणी हैं, वे सभी सुखी हों तथा सभी निरोगी हों. सभी प्राणी अच्छा ही देखें तथा किसी को भी किसी प्रकार का कोई दुःख न रहे. यह हिन्दुओं का मौलिक सिद्धान्त है. भारत के ऋषियों की जीवन, जीव और जगत को देखने की यह महत्वपूर्ण दृष्टि रही है.’

क्रमांक 4. सर्वजन-समन्वयात्मिका-प्रज्ञा: उन ऋषियों को यह भी ज्ञात था कि कालान्तर में कभी भी अपने-अपने विचारों को लेकर आपसी मतभेद एवं टकराव की स्थिति बन सकती है. सबसे ज्यादा टकराव पैदा करते हैं बुद्धिमान एवं तथाकथित ज्ञानी लोग. बुद्धिमान लोगों का झगड़ा बड़ा गहरा होता है. अज्ञानी व निरक्षर तथा कम शक्ति वाले लोग तो कम झगड़ा करते हैं. कुछ दिन बाद पुनः मेल-मिलाप भी कर लेते हैं. लेकिन विद्वान् लोग तो ऐसा झगड़ा करते हैं कि बाँट करके ही रहते हैं. ऋग्वेद में ऋषियों ने साधिकार एवं स्वाभिमान के साथ घोषणा की कि वह ‘परमात्म-तत्व’ या ‘परम सत्य’ एक ही है, किन्तु उस तक पहुँचने के मार्ग अनेक हो सकते हैं. बड़ी सुन्दर ऋग्वेद की ऋचाओं में बोलकर वे गये हैं. उन ऋषियों द्वारा दिया गया यह दिशाबोध सैकड़ों प्रकार के विचारों तथा स्वभाव वालों को एक बनाकर रखने का एक ‘महाअभियान’ था. यह एक ऐसा अद्भुत सूत्र रहा जिसमें उन्होंने कहा-

”इन्द्रं मित्रं वरुणं अग्निमाहुर्तो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्.

एकं सद् विप्राः बहुधावन्त्यमग्निं मातरिश्वान माहु..“, (ऋग्वेद)

इस मन्त्र का भाव सन्देश यह है कि कोई अपनी इच्छानुसार किसी की भी उपासना करने को स्वतन्त्र है जैसे कोई – इन्द्र की पूजा करे, सूर्य की पूजा करे, वरुण की पूजा करे अथवा अग्नि की पूजा करे. वे सब एक ही दिव्य स्वरूप की ओर ही जा रहे हैं, ऐसा विश्वास रखिये. ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’, कहने से ध्यान में आता है कि वह परम् सत्य तो एक ही है. सभी अपनी-अपनी रुचि-प्रकृति के अनुसार बहुत प्रकार से उसका वर्णन करते हैं तथा विविध प्रकार से अपना मार्ग तय करते हैं. इतना ही नहीं, इस मन्त्र ने हजारों वर्ष पूर्व, भारतीय संस्कृति के प्रातःकाल में ही ‘सर्वे समावेशी’ सिद्धान्त को सर्वसहमति से स्वीकार कर लिया. हिन्दुओं के हृदय को अति विस्तीर्ण करते हुए ईश्वरोपासना में सभी मार्गों तथा सभी पूजा पद्धतियों को उन्होंने विनम्र अनुमति दे दी.

इस मन्त्र पर जितना गहन विचार हम करेंगे, हमको ध्यान आयेगा कि यह आविष्कार कितना महत्वपूर्ण एवं प्रभावी था. जितना इस सूत्र के ऊपर हम सोचेंगे उतनी ही हमारी श्रद्धा उस महान ऋषि पर बढ़ती ही चली जायेगी. कितना दूरद्रष्टा रहा होगा वह महान ऋषि? उस ऋषि ने ईश्वर-आराधना के क्षेत्र में अभूतपूर्व समन्वय की आधारशिला स्थापित कर दी.

‘हिन्दू-दर्शन’ की महायात्रा के विविध पड़ावों को स्मरण में रखना आवश्यक

इस प्रकार हमारे इस दर्शन द्वारा प्रतिपादित ये चार मौलिक बिन्दु हमारे यहाँ अर्थात् इसी भारत भूमि पर ही उत्पन्न हुये थे जिनपर हमारे ये सभी ऋषि एवं दार्शनिक एकमत थे. इन चारों ही मौलिक सिद्धान्तों पर किसी को भी कोई मतभेद नहीं था. हम देखते हैं कि इस दर्शन को लेकर हिन्दुत्व की एक लम्बी यात्रा चली और लगातार चलती ही रही.

इस सुदीर्घ-यात्रा के प्रथम चरण में ऋषियों ने सिद्धान्त रूप में स्वीकृत इन विचारों को नीचे तक पहुंचाने का माध्यम यज्ञ की ‘अग्नि’ को माना. यज्ञ की ‘अग्नि’ को साक्षी मानकर वे मंत्रों का उच्चारण करते रहे. ‘अग्नि’ को साक्षी मानकर सद्विचारों को नीचे तक ले जाने का प्रयत्न वे करते हैं. ‘अग्नि’ को साक्षी मानकर उन्होंने अपने जीवन को तपस्वी और साधक बनाकर भौतिकवादी विश्व साम्राज्य से मानवीय समाज को धीरे-धीरे भौतिक उपभोग कम करने की ओर निरन्तर प्रवृत्त किया. ऋषियों का संदेश है कि दृश्य जगत में जो भी कुछ है, वह मेरा नहीं परमेश्वर का ही है. ‘अग्नि’ के सामने लिये गये इन संकल्पों में वे यही कहते हैं कि हम अपने लिये ही नहीं समग्र जगत के हितार्थ अपनी शक्तियों को समर्पित करें. ‘यज्ञ’ और यज्ञ की ‘अग्नि’ यहाँ पर एक पवित्र साक्षी भाव के साथ एक मौलिक भूमिका में स्वीकार की गई थीं. वैदिक ऋषियों को ज्ञानमय, सुखमय तथा त्यागमय जीवन ही अभीष्ट था. सभी विषयों की गहराई में जाने की उनकी रूचि रही.

कालान्तर में ‘यज्ञों’ के अन्दर कर्मकाण्ड बढ़ते चले गये, और उसके पीछे निहित मूल दर्शन छिप गया और साथ ही कुछ उपेक्षित भी हो गया. मँहगे कर्मकाण्डों तथा कर्मकाण्डों के अतिरेक के कारण सभी चिन्तित थे. इसी कारण, आगे चलकर एक ‘औपनिषदिक’ काल आता है और इस औपनिषदिक काल में ‘सनातन-मूल-दर्शन’ को ऋषियों ने अलग से निकाल कर के सभी के सम्मुख रखा और इसको कर्मकाण्ड से दूर रखा. हमारे उपनिषद ज्ञान के संकलित भण्डार बने. यह हिन्दू-दर्शन की यात्रा का दूसरा चरण कहा जा सकता है.

समय बीता और उपनिषद् भी कुछ विद्वानों तक ही सीमित रह गये. बहुत बड़ा समाज कर्मकाण्डों में फिर से उलझ गया. ये उपनिषद् सारे समाज में लोक-भाषाओं या लोक-बोलियों में नीचे तक नहीं पहुँच सके. यह वह कालखण्ड है जब हिन्दू समाज में एक बहुत बड़ा कोलाहल शुरू हो गया. सारे हिन्दू समाज में इन जटिल और मँहगे कर्मकाण्डों और कुछ विद्वानों के भी मूल विचारों से दूर हटने के कारण उस समय एक नया परिवर्तन आता है. इस काल में हम तथागत बुद्ध और महावीर को सामने देखते हैं. उन्होंने एक ओर बलि-प्रथा को नकारा तथा सभी प्रकार के कर्मकाण्डों को कम से कम करने या निरर्थक बताने की कोशिश भी की. समाज में अहिंसा, साधना, तप, सत्य, त्याग आदि की महिमा का एक बार फिर से प्रतिस्थापन किया. यह एक ऐसा काल था जब हिन्दू दर्शन, ‘बुद्ध’ और ‘महावीर’ के विचारों के साथ सर्वदूर व्याप्त होने लगा.

तथागत का बौद्धमत-करुणा, ममता, प्रेम और भ्रातृत्व का भाव लेकर दुनिया के विविध देशों में पहुँच गया. विश्व के दूरस्थ स्थानों में लाखों लोगों ने बौद्ध मत को स्वीकार कर लिया. यह भारत के सनातन मूल सिद्धान्तों की विजय का काल था. हम यह बात भी ध्यान में रखें कि बौद्धमत विश्व का प्रथम संघबद्ध मत रहा. यह हिन्दू-दर्शन की यात्रा का तीसरा चरण कहा जा सकता है. आगे चलकर वहाँ भी अनेक समस्यायें खड़ी हो गईं और पुनः ‘वैदिक-दर्शन’ की आवश्यकता समाज को अनुभव होने लगी.

हिन्दू दर्शन की इस यात्रा का अब एक चौथा चरण आता है. इस चौथे चरण में हम आद्य शंकराचार्य एवं उनकी परंपरा को पाते हैं. आद्य शंकराचार्य के साथ उनके अनेक विद्वान् अनुयायी भी हैं. शंकराचार्य ने भी अनावश्यक कर्मकाण्डों को कम से कम करने की कोशिश की और फिर से हिन्दू दर्शन के इस मौलिक स्वरूप को सामने लाने का प्रयत्न किया. हम यह भी देखते हैं कि आद्य शंकराचार्य पहली बार इस दर्शन को लेकर इस राष्ट्र की भौगोलिक एकता को बनाये रखने तथा इसको पुनर्स्थापित करने का कार्य करते हैं. पूजा-पाठ में स्थापित सैकड़ों देवी-देवताओं के स्थान पर वे पंचायतन पूजा लाकर इसको व्यवस्थित करते हैं. ‘सर्वात्मैक्य’ का संदेश देकर सभी के अन्दर ईश्वर की समानता को स्थापित करते हैं. चाण्डाल को भी गुरु के रूप में स्वीकार करने में उन्होंने संकोच नहीं किया. आज हिन्दू समाज का जो स्वरूप दिख रहा है, उसमें आद्य शंकराचार्य का योगदान अभूतपूर्व है. इस प्रकार 15-20 हजार वर्षों की यह एक बड़ी सुदीर्घ यात्रा है. ‘हिन्दू-दर्शन’ एवं ‘हिन्दुत्व’ का यह बड़ा पुण्य-प्रवाह भी है जो अनवरत और अनथक चलता ही रहता है.

 

 

सभी से कुछ न कुछ ग्रहण करने का स्वभाव

इस महान् दर्शन को नीचे सामान्य जन तक पहुँचाने के लिये कोई न कोई विधि हिन्दुओं ने स्वीकार की थी. समय-समय पर उसमें परिवर्तन अवश्य होते रहे लेकिन यह बात भी सच है कि हर नये परिवर्तनकारी सुधारक या दार्शनिक से हिन्दू समाज कुछ न कुछ ग्रहण कर लिया करता था. हर नया समाज सुधारक या नया दर्शन देने वाला महापुरुष हिन्दू समाज को उसके मौलिक दर्शन के और अधिक निकट ले आता था. ‘हिन्दू-दर्शन’ की यह एक अनन्य-साधारण बात है. अब वे चाहे तथागत बुद्ध थे या महावीर, वे शंकर थे या नानक या कोई और, ऐसे हजारों लोग रहे जो इस महान परंपरा के साक्षी थे. ऐसा लगता था कि वे कुछ नया दे रहे हैं किन्तु सच्चाई यह रही कि वे कुछ नया नहीं देते थे वरन् परिष्कार करते हुए उस पुराने मौलिक दर्शन की ओर ही हिन्दू समाज को पुनः पकड़कर ले आते थे. इसलिये अनेक प्रकार की पूजाओं और विचारों में से कुछ न कुछ हिन्दू समाज ले ही लेता है. सभी जगह से कोई न कोई अच्छी बात ग्रहण कर लेने का हिन्दू समाज का यह स्वभाव सदैव बना रहा.

कुछ लोगों को भ्रम होना स्वाभाविक है, किन्तु हमें यह ध्यान रखना है कि उपनिषद, वेदों के विरोधी नहीं वरन् पूरक हैं. बुद्ध तथा महावीर, उपनिषदों के दर्शन के विरोधी नहीं हैं. शंकर भी बुद्ध एवं महावीर के विरोधी नहीं हैं. रामानुजाचार्य के बाद का ‘भक्ति-आन्दोलन’ शंकराचार्य का विरोधी नहीं है. यह विरोध या वैर में से उपजा विकास क्रम नहीं है – यह काल क्रमानुसार सतत परिवर्तनशील ‘एकात्म-प्रवाह’ है. इस प्रवाह में मूलदर्शन यथावत रहता है. इसमें प्राणतत्व समान है. जैसे- एक बालक जन्म लेता है तब वह कैसा होता है ? यही बालक जब तरुण होकर फुटबॉल के मैदान पर दौड़ता है, तब वह कैसा दिखायी देता है ? क्या यह वही नन्हा बालक है जो पैदा हुआ था? नहीं, यह वह नहीं है. वह तो हिल भी नहीं सकता था. यह सच है कि असीमित क्षमतावान यह तरुण वह शिशु नहीं है. यही तरुण एक दिन वृद्ध हो जाता है, एक-एक कदम चलना कठिन हो जाता है, चारपाई पर गिर पड़ता है. तब प्रश्न उठता है कि क्या यह वही तरुण है जो मैदान पर दौड़ता था? नहीं, यह अब वह नहीं रहा. किन्तु, ध्यान से देखिये प्रत्येक अवस्था में बालक वही है. वह बालक रूप बदलता है, आत्मा वही है, जीव वही है. यही हिन्दुत्व है जो कभी वैदिक तो कभी अवैदिक के रूप में, कभी शैव तो कभी वैष्णव के रूप में, कभी जैन तो कभी बौद्ध के रूप में, कभी सिक्ख तो कभी आर्य समाज के रूप में अपना स्वरूप धरता है. जैसी आवश्यकता पड़ती है तब उसी रूप में उन परिस्थितियों में यह अखाड़े में उतरता है और उन परिस्थितियों में उत्पन्न चुनौतियों पर विजय पाता है. किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिये सदैव उद्यत रहता है किन्तु, अपने विशिष्ट दर्शन को सदैव संभालकर रखता है और अनथक, अविश्रान्त चलता ही रहता है. यहाँ विराम नहीं निरन्तरता है, प्रवाह है, गतिमानता है यही हिन्दुत्व का वैशिष्टय है.

पूजा पद्धतियों का विकास:

वैदिक काल में हमें कहीं बड़े विशाल मंदिर दिखाई नहीं देते. वैदिक काल में मूर्तियाँ भी प्रचलन में नहीं थीं. वैदिक काल में पूजा, पाठ जैसे कर्मकाण्डों का जोर इतना नहीं था तथा पूजा शब्द भी कहीं नहीं आया था. लेकिन, कालान्तर में बुद्ध के अनुयायियों ने जब बुद्ध की विशाल और सुन्दर मूर्तियाँ बनाईं तो उनकी मूर्तियों की आरब्ध परंपरा को अन्य हिन्दुओं ने भी स्वीकार कर लिया. हम देखते हैं कि वैदिक परंपरा में ‘सृष्टि में लय’ (विनाश) के देवता के रूप में ‘रूद्र’ स्थापित थे जो आगे चलकर ‘शिव’ के रूप में प्रकट हुये और धीरे-धीरे पूरा शिव परिवार हमारे मंदिरों में स्थापित होते हुए हमको मिलता है. हमें यह भी देखने को मिलता है कि जो तांत्रिकों के मंत्र भी हमारे पूजा-पाठ में सम्मिलित होते गये. हमारे कर्मकाण्डों से हिंसा और बलि प्रथा भी बड़ी मात्रा में आई और फिर धीरे-धीरे दूर हो गयी. पुरानी बलि-प्रथा के स्थान पर नारियल फोड़ने का विकल्प निकाल लिया गया. इसका श्रेय तथागत बुद्ध के विचार को ही देना होगा. आद्य शंकराचार्य ने गीता को महाभारत में से निकालकर हमारे सामने पुनः रखा और पूजा पद्धतियों में व्यापक फैले कर्मकाण्डों को कम करने का प्रयास भी किया.

इस प्रकार, हम यह पाते हैं कि पूजा और कर्मकाण्डों की विविधताओं एवं परिवर्तनों को लेकर हिन्दुत्व की यह एक विशेष प्रकार की अनूठी यात्रा है, जो हरएक से कुछ न कुछ स्वीकार कर लेती है लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि ‘वैदिक-दर्शन’ का मूलभाव अपनी महत्वपूर्ण जगह हर काल में बनाये रखता है. वैदिक ऋषियों से लेकर ज्ञानेश्वर, रामानुज, रामानन्द, कबीर, रैदास, नानक तथा चैतन्य तक वह दर्शन पक्का और अनवरत है. उसका केवल आवरण या कलेवर बदलता है, ऊपर के वस्त्र बदलते हैं, चोला बदलता है. कबीर, रैदास, गुरुनानक देव द्वारा मूर्ति पूजा का निषेध तथा महात्मा गाँधी की अहिंसा में महात्मा बुद्ध का संदेश प्रभावी रूप से दिखता है. किन्तु, शंकर के अनुयायी वेद, उपनिषद तथा गीता के दर्शन को बनाये रखते हैं. यह यात्रा बड़ी अद्भुत और रोमांचकारी है. इसी यात्रा के रूप में हिन्दू अपने मौलिक दर्शन को सहेज कर रखता है तथा अपनी पूजा-पाठ की पद्धतियों को बदलता रहता है और आगे बढ़ता जाता है.

हिन्दू शब्द के तीव्र प्रचलन का एक कारण यह भी

सबसे विचित्र बात जो प्रारंभ में हमने देखी कि ऋषियों ने स्वयं अपने आपको (अपने समाज को) कोई विशेष संज्ञा या नाम नहीं दिया था. यह भी सारी दुनिया के लोगों को अचंभित करने वाली बात थी. क्योंकि, जिस आध्यात्मिक दर्शन और संस्कृति ने भारतीयों को सारा जीवन प्रभावित करने के लिये प्रेरित किया था, जिस दर्शन को लेकर भारतीयों ने अपने सारे जीवन को गढ़ा था किन्तु, उन्होंने स्वयं अपने आपको विशिष्ट पहचान देने के लिये कोई शब्द नहीं दिया. यह भी एक आश्चर्य की बात थी कि जिस दर्शन ने सैकड़ों पंथ, उपपंथ, सम्प्रदायों और विचारों को बड़े आनन्द से अपने आंगन में फलने-फूलने एवं स्वतन्त्रता के साथ विकसित होने का अवसर तो दिया था, किन्तु उसको उन्होंने कोई विशिष्ट नाम देकर संकुचित या सीमाबद्ध करने का प्रयास कभी नहीं किया. ‘हम’ की सामूहिकता को कोई नाम देना उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया. भारतवासी मिलकर कौन हैं, इसको किसी एक ‘संज्ञा’ में सीमित करना उनको कभी अभीष्ट नहीं रहा. इसलिये यह नई और विचित्र बात लोगों को लगती थी कि भारत के ये लोग कौन हैं ? कभी-कभी अपने आपको वर्तालाप में उन्होंने ‘आर्य’ जरूर कहा, लेकिन वह ‘आर्य’ शब्द संज्ञा के स्थान पर विशेषण ही अधिक माना गया.  उनको यह आभास होता था कि यदि ‘हम’ को कोई संज्ञा दी गई तो एकात्म ‘हम’ विभाजित हो जायेगा. तब यह ‘हिन्दू’ शब्द इतना अधिक प्रचलन में कैसे आ गया? लोगों के मन में इस बात को लेकर अनेक प्रश्न उत्पन्न होते हैं. उन सब प्रश्नों का उत्तर देने के लिये आज का विषय नहीं है, लेकिन फिर भी एक व्याख्या आपके सामने प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूँ, हो सकता है उससे कुछ लोग सहमत हों तथा कुछ लोगों की मतभिन्नता भी हो.

इस्लाम के आक्रमण के बाद सारे देश में ऊहापोह के साथ एक नया उपद्रव और व्यापक असन्तोष व्याप्त हो गया था. नव आक्रमणकारी इस्लाम, भारत में रहनेवाले सभी लोगों का सामान्य और सर्वमान्य शत्रु था. यहाँ भारत में कुछ लोग जैन थे या बौद्ध थे, वे नाथ थे या सिद्ध थे, वे शैव थे और वैष्णव आदि अनेक प्रकार के मतों को मानने वाले थे. वे कोई भी रहे हों, इस्लाम सबको अपना आहार ही मानता था. इस्लाम सबको खा जाने के लिये आतुर और कृत-संकल्पित था. आक्रामक इस्लाम, दुर्दान्त शत्रु के रूप में सभी भारतीयों के सामने खड़ा हुआ था. सबके लिये बड़ा संकट बनकर वह यहाँ भारत में आया था. सामने शत्रु के रूप में खड़ा इस्लाम और हम कौन ? यह एक सामूहिक प्रश्न सभी के मस्तिष्क में अवश्य आया होगा. इस्लाम के सामने हम बँटे हुये थे और विभाजित थे. हम भिन्न-भिन्न पंथों में और सम्प्रदायों में बिखरे हुये थे और हमारी कोई सामूहिक पहचान भी ध्यान में नहीं आती थी. एक बड़ा प्रश्न लगातार सभी के सामने खड़ा था कि वे मुसलमान हैं और हम कौन हैं? हम कौन हैं, इस बड़े प्रश्न ने एक विचार करने के लिये लोगों को उद्वेलित किया और धीरे-धीरे लोगों को लगा कि हमारी भी कोई सामूहिक पहचान होनी चाहिये. निश्चय ही यह एक बड़ा संकट का काल था. उस समय सभी भारतवासियों को यह लगा  होगा कि यह ‘हिन्दू शब्द’ हमारे लिये सामूहिक रूप से उपयुक्त है और देखते ही देखते आठवीं और नौवीं शताब्दी के बाद इस देश का प्रत्येक पंथ, संप्रदाय, दर्शन और विचार इस हिन्दू के बड़े छाते के नीचे आ गया. शायद इस शब्द को पाकर वह सामूहिक बचाव का अनुभव भी करता था. भारतीय समाज ने इस शब्द के साथ सामूहिक शक्ति का आभास किया. सामूहिक सुरक्षा व सामूहिक संरक्षण के साथ-साथ एक-मात्र आशा की किरण भी शायद उसको इस ‘हिन्दू’ शब्द की सामूहिकता के साथ दिखती थी. इस शब्द में कुछ सामूहिक भाव, संतोष तथा आत्मविश्वास भी था. गुरु नानक देव ने कहा – ‘ये मुगल आ गया है और यह हम सभी को मार रहा है’. तो हम कौन ? हम ‘हिन्दू’, ये आक्रमणकारी मुसलमान हैं. चैतन्य महाप्रभु ने कहा ये सामने आक्रमणकारी ‘मुसलमान’ हैं तो प्रश्न खड़ा हुआ कि हम कौन हैं ? सभी भारतवासियों को लगा कि हम हिन्दू हैं. कबीर, रैदास, समर्थ गुरु रामदास, शिवाजी, गुरुगोविन्द सिंह, राणा प्रताप, चन्दरबरदायी सब ने यही कहा – ये सामने ‘मुसलमान’ हैं, हम कौन हैं ? हम ‘हिन्दू’ हैं, यह सामूहिक स्वीकृति का परिणाम था. ऐसा वातावरण बना कि इस देश का प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी पंथ या संप्रदाय का था, उसने अपने आपको हिन्दू कहने में आनंदित, सुरक्षित और गौरवान्वित अनुभव किया. इस शब्द को सभी ने आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला पाया. देखते ही देखते पंजाब-सिंध से लेकर असम तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और केरल तक यह ‘हिन्दू’ शब्द स्वीकार होता चला गया. देश में यह एक अभूतपूर्व परिवर्तन था. इस प्रकार, भारतीय समाज ने अपने लिये नवीन, सामूहिक और सुगठित पहचान का वरण किया जिसको परंपरा से आज ‘हिन्दू’ नाम से जानते हैं .

पृथ्वी हम सभी की एकात्मता का एक और आधार:

हमारे ऋषियों ने ‘एकात्म-बोध’ के लिये ‘सर्वव्यापी परमेश्वर’ का सिद्धांत दिया था. उस परमेश्वर के अंश के कारण हम सब एक हैं, सारे समाज की यह ‘एकात्म’ पहचान बनाने की वे कोशिश करते थे. सर्वत्र ईश्वर की व्याप्ति तथा हम सबके अंदर भी वही ईश्वर है- यह उनका मूलमन्त्र था. ऋषि लोग इस बात को भी जानते थे कि कभी एक समय ऐसा भी आ सकता है, जब ईश्वर के अस्तित्व को लेकर ही विवाद खड़ा हो जाये. जब यह विवाद खड़ा होगा, तब क्या होगा ? यदि ऐसे लोग खड़े हो जायेंगे जो ईश्वर के अस्तित्व को लेकर एक प्रश्नवाचक चिन्ह लगा देंगे और कहेंगे हम ईश्वर को नहीं मानते तब एकात्मता के इस आधार का क्या होगा? तब उन दूरद्रष्टा ऋषियों ने कुछ अन्य ऋचाओं और अन्य सूक्तों का साक्षात्कार किया. अब उन्होंने एकात्मभाव जगाने वाले एक अन्य सिद्धान्त का प्रतिपादन किया. उनका मानना रहा कि यह जो पृथ्वी है, सबके लिये एक है, यह उनकी एक दूसरी ‘आत्मानुभूति-पूर्ण’ ‘एकात्म-भाव’ की खोज थी. ऋषियों ने माना कि इस धरती पर हम बड़े हुये हैं और इस धरती पर ही हम पले हैं. इस धरती का अन्न, जल, वस्त्र, औषधि, मकान सभी कुछ आवश्यक वस्तुयें हमको इस धरती से ही प्राप्त हुई हैं. यह धरती हम सबके लिये एक है. यह धरती जीवनभर हमारा पालन करती है. धरती के इस पवित्र भाव को ध्यान करते-करते वे लोग कृतज्ञ भाव से भर गये और सामूहिक भाव से गाने लगे कि यह धरती हम सबकी माँ है – ”माता भूमि पुत्रो ऽ हम् पृथिव्याः.” (अथर्ववेद-  )

सभी के अन्दर ‘एकात्म-भाव’ का बोध कराने वाला यह एक अति सुन्दर और अभूतपूर्व भाव था. यह सूक्त कहते ही ऋषियों ने इस बात को स्वीकार किया कि यह पृथ्वी हम सबकी माँ है. वे ऋषि पृथ्वी (धरती) के प्रति अत्यन्त श्रद्धा से भरे हुये थे. धरती के प्रति श्रद्धा और भक्ति के भाव को वे जन-जन तक पहुँचाना चाहते थे. हम देखते हैं कि इस बात को जन-जन के हृदय में गहराई तक बैठाने का प्रयास उन्होंने बहुत ही प्रयत्नपूर्वक किया.

पृथ्वी का पुत्र होने का भाव अद्भुत है

इस ऋचा का भाव यह है कि समस्त पृथ्वी मेरी माँ है. उदाहरणस्वरूप- मेरी जन्मभूमि तो भोपाल है लेकिन सम्पूर्ण पृथ्वी मेरी माता है. मैं समस्त पृथ्वी का पुत्र हूँ. मैं ‘भोपाल- माता’ का पुत्र नहीं हूं, मैं ‘मथुरा- माता’ का पुत्र नहीं हूँ. हमारे ऋषियों ने इस धरती का विभाजन करने की कोशिश नहीं की. जब उन्होंने कहा – ‘यह भूमि माता है’ तब भूमि को माता कहते ही तुरन्त कहा कि ‘मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ’.

‘सारी पृथ्वी का पुत्र होने की बात’ कहना एक बड़ी दीक्षा थी. इस बड़ी दीक्षा के संस्कार ने सारे समाज की दृष्टि को ही बदल दिया. इस दृष्टि को भी वही ‘एकात्म-भाव’ के आयाम मिल गये जो एक सर्वव्यापी ईश्वर के भाव के कारण सबको प्राप्त होते थे. “धरती-माता” कहते ही सभी के अंदर सारी पृथ्वी के प्रत्येक अवयव के प्रति एक पवित्र भाव पैदा हो गया. सारी पृथ्वी मेरी माता है और उसका पुत्र रूप ‘मैं’ उसकी पूजा करनेवाला, उसकी भक्ति करने वाला तथा उसके सेवक रूप में यहाँ पर प्रकट हुआ हूँ. वेद की यह ऋचा पुत्र होने की दीक्षा का एक महान् संस्कार लेकर के आई थी. हम देखते हैं कि वेद के ‘पृथ्वी सूक्त’ के साथ-साथ ऋषियों ने सैकड़ों ऋचाओं में पृथ्वी का कितना सुन्दर स्तवन किया है. हम कह सकते हैं कि वह इस पृथ्वी का एक ‘पुण्याह्वाचन’ है. ऋषियों के इस दर्शन ने इस धरती को वही पवित्रता का रूप दे दिया जो एक परमात्मा को दिया गया था.

भूमि (धरती) को माता मानते ही उसका भाव विस्तार पाने लगा. यह बात गहरी बैठने लगी कि समस्त पृथ्वी विशाल कुटुम्ब स्वरूप ही है. जब उन ऋषियों ने कहा – ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तब इस सारी पृथ्वी को एक विशाल परिवार के रूप में उन्होंने अनुभव किया. जब उन्होंने कहा – “जनम् बिभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणां पृथ्वी यथौकसम्..” (अथर्व 12.1.45). यह दर्शन बहुत ही महत्वपूर्ण था. इस ऋचा का शब्द -‘पृथ्वी यथौकसम्’ कहते ही सारी की सारी पृथ्वी एक घर जैसी हो गई. घर कहते ही परिवार और कुटुम्ब की व्याख्या विस्तार पा गई. उन्होंने कहा कि सारी पृथ्वी में एक अविभाज्य कुटुम्ब के रूप में एक समाज है. सर्वव्यापी ईश्वर की मान्यता के कारण से जो ‘भक्ति’ का भाव समस्त मानव समाज में आ रहा था तथा सारे समाज में ‘एकात्मता’ का भाव उत्पन्न हो रहा था, वही एकात्म-भाव ‘पृथ्वी’ के प्रति इस ‘मातृभाव’ ने भी उत्पन्न कर दिया.

विराट् पुरुष की कल्पना:

भारत के वे ऋषि यहीं नहीं रुके. ऋषियों ने एकात्मभाव उत्पन्न करनेवाला एक और दर्शन दिया और कहा कि- हम सभी एक विराट् पुरुष के छोटे से अंग हैं. एक विराट् की एक छोटी इकाई  हम हैं. सम्पूर्ण समाज एक विराट् पुरुष है और विराट् पुरुष की हम एक यूनिट हैं, एक अंग है. इस विराट् पुरुष से भाव यह था कि समाज का प्रत्येक वर्ग इस विराट् पुरुष का ही एक भाग है. हम सभी मिलकर एक विराट् पुरुष हैं. सभी की एकात्मता से उस विराट् की पूर्णता है. ‘ऋषि कहता है – ‘सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात.’ भाव वही है कि विराट् के हजारों सिर हैं, हजारों आँखें, हजारों पैर हैं तथा इसमें हमारा भी एक सिर, हमारे भी हाथ-पैर सम्मिलित हैं. यह एकात्म भाव है. सभी मिलकर एक विराट् पुरुष का निर्माण करते हैं.

‘एकात्म-भाव’ को देने वाला यह एक तीसरा दर्शन था. यह ‘भद्र-दृष्टि’ है और यह ‘एकात्म-दृष्टि’ भी है. इस ‘भद्र-दृष्टि’ से लोकमंगलकारी कामनायें ही निकलेंगी. यह विशेषता है इस देश की और यही ‘हिन्दू-दर्शन’ का आधार बिन्दु है. ‘हिन्दू-दर्शन’ का यह केन्द्र बिन्दु है, जिसने सर्वदूर ‘एकात्मदर्शन’ को अनुभूत किया. हमारी संस्कृति इस दर्शन के चारों ओर घूमती है. हमारी संस्कृति के अन्दर की जो आत्मा है, वह यही दर्शन है.

यह दर्शन भारतीय है, यही दर्शन वैश्विक भी है:

जब हम कहते हैं कि यह दर्शन भारतीय है, लेकिन यह दर्शन वैश्विक भी है. वैश्विक होते हुये भी यह भारतीय है और भारतीय होते हुये भी यह वैश्विक है. क्योंकि इस दर्शन में कोई भी बात करते समय यह सदैव ध्यान में रखना है कि उस बात से विश्व का कल्याण होता है या नहीं? यदि कोई बात विश्व के किसी भी अंग के लिये हानि देनेवाली है तो हमारी दृष्टि में अकरणीय है, वह अधर्म है. उदाहरणस्वरूप चाणक्य जब मगध राज्य के लिये आर्थिक नीति लिख रहे थे तब उन्होंने स्पष्ट किया कि अर्थशास्त्र वह है जो पृथ्वी की पालना करे, सम्पूर्ण पृथ्वी के लाभ की बात करे, वही अर्थशास्त्र है. वे कहते हैं – ‘पृथिव्याः लाभ पालनो पायः शास्त्रम् अर्थशास्त्रम् इति.’ भाव यह है कि भारत का दर्शन सदैव विश्व कल्याण की ही कामना करते हुये अपने जीवन के सभी आयामों का विचार करता है. आज जो लोग वैश्वीकरण की बात करते हैं तथा डब्ल्यूटीओ, आईएमएफ, अथवा ग्लोबलाइजेशन, की चर्चा करते हैं, उनको यह बात सदैव ध्यान में रखनी होगी कि उनके इस वैश्वीकरण का आधार विशुद्ध आर्थिक और लाभ कमाने के उद्देश्य वाला है किन्तु, भारत का यह ‘वैश्विक-एकात्मभाव’ का दर्शन विशुद्ध अध्यात्मिक है. ‘अध्यात्मभाव’ में किसी का कुछ भी स्वार्थ नहीं होता. इस ‘ग्लोबलाइजेशन’ में बाजार है, ‘व्यापार’ है, लाभांश है और कुल मिलाकर कहें तो इन सभी के केन्द्र में आर्थिक लाभ कमाने की स्वार्थ-दृष्टि ही प्रमुख है. इसीलिये, आज जो वैश्वीकरण की बात करके विश्व की एकता की चर्चा करते हैं वे नितान्त स्वार्थी लोग हैं. केवल अर्थ की प्राप्ति के लिये, दुनिया में अर्थ कमाने के लिये घूम रहे हैं, उनके अन्दर दूर-दूर तक ‘विश्व-परिवार’ अथवा ‘विश्व-एकात्म-भाव’ की झलक भी नहीं है. श्री रवीन्द्रनाथ टैगौर ने उनकी इस मनोववृत्ति के ऊपर कहा है कि- ‘पूर्वकाल में वे संगठित होकर दूसरों को पराधीन बनाकर शोषण करते थे और आज वे ही लोग संगठित होकर किसी भी प्रकार से लाभ कमाने को घूमते हैं.’

दूसरी ओर, जो लोग इस ‘ऋषियुक्त-एकात्मभाव’ का दर्शन कर रहे हैं और जागतिक दृष्टि से सोच रहे हैं वे एक ‘वैश्विक-दृष्टि’ से सोच रहे हैं वह ‘एकात्म-दृष्टि’ है, ‘आत्मीय-दृष्टि है’ वही ‘भारतीय-दृष्टि’ है और वही हिन्दू-दृष्टि है. इसलिये मित्रो! भारतीय दर्शन पूर्णतया भारतीय है और साथ ही साथ यह भारतीय दर्शन पूर्णतया वैश्विक भी है. क्योंकि यह विश्व की मंगलकामनाओं के साथ ही चलता है. इसी दर्शन को लेकर के हमारा राष्ट्र जीवन विकसित हुआ है. इस राष्ट्र जीवन को समझने की आवश्यकता है. इस दर्शन को यदि हम छोड़ देंगे तो हम यहाँ के ‘राष्ट्र-जीवन’ को तथा ‘राष्ट्र-दर्शन’ को समझ नहीं सकेंगे.

बाह्य आक्रमणकारियों पर हिन्दुओं की दार्शनिक और सांस्कृतिक विजय

इस ‘हिन्दू-राष्ट्र-दर्शन’ को समझने के लिये हम कुछ घटनाओं का स्मरण करते हैं. ये घटनायें अपने ‘हिन्दू-राष्ट्रीय-दर्शन’ के गौरवशाली क्षणों का स्मरण कराती हैं तथा इन घटनाओं के आधार पर हम ‘हिन्दू-राष्ट्र’ को और गहराई से समझ भी सकेंगे. इतिहास का यह क्रमबद्ध घटनाक्रम है. इसके अध्ययन से हमको यह स्मरण में आयेगा यह ‘हिन्दू-राष्ट्र’ संकट के समय किस प्रकार संघर्ष करता है.

ईसा से लगभग 300 वर्ष पूर्व से लेकर के ईसा के बाद छठवीं शताब्दी तक देश पर चार प्रकार के बड़े-बड़े आक्रमण हुये. इन आक्रमणकारियों में ग्रीक (यूनानी), शक, कुषाण तथा हूणों के आक्रमण प्रसिद्ध हुये हैं. पांचवां आक्रमण असम के ऊपर थाई देश के लोगों का हुआ किन्तु, यह आक्रमण 13वीं शताब्दी का था.

ग्रीक (यूनानी) लोग भारत में आये वे हारे भी और जीते भी. हम यह जानते हैं कि ग्रीक लोगों में से ही एक बड़ा प्रतापी राजा मीनियंडर था. नागसेन नामक विद्वान् भिक्षु के साथ वार्तालाप और शास्त्रार्थ करते-करते वह बौद्ध बन गया. वह आगे चलकर बौद्ध भिक्षु बना तथा बौद्ध धर्म के विस्तार के लिये उसने बड़ा कार्य किया. डिमिट्रयस भी एक ग्रीक राजा था. यह ग्रीक (यूनानी) राजा भारत में विजय प्राप्त कर पश्चिमी सीमा पर रहता था. वह दिमित्र नाम पाया. और भी अनेक ग्रीक (यूनानी) राजाओं का भारतीय संस्कृति और समाज में सहज विलीनीकरण हो गया.

विदिशा में खड़ा हुआ गरुड़-स्तंभ हिन्दू ‘राष्ट्र-दर्शन’ की विजय का एक महत्वपूर्ण प्रतीक स्तम्भ है. वह भी कुछ कहता है. ईसा के भी कुछ वर्षों पूर्व हेलीयोडोरस नाम का एक ग्रीक राजदूत यहाँ विदिशा में सपरिवार आकर रहता था. यहाँ के लोगों से चर्चा-वार्ता करते-करते वह परम-भागवत वैष्णव हो गया था. उस स्तंभ पर उसने लिखवाया है कि ”मैं हेलीयोडोरस परम-भागवत हो गया.“ उसका समस्त परिवार भी वैष्णव मत को मानने वाला परम-भागवत हो गया था. उन दिनों तक्षशिला का राजा अन्तिअलिकिदस ग्रीक था, वह भी वैष्णव हो गया था. हेलियोडोरस का भाई थियोडोरस भी वैष्णव हो गया था. इन सभी को वैष्णव किसने बनाया ?

आक्रमणकारियों की एक दूसरी लहर में हम देखते हैं कि बर्बर और क्रूर शक आक्रमणकारी लोग भारत में आये और भारत में दूर-दूर तक फैल गये. उन्होंने उज्जैन पर भी शासन जमा लिया था. फिर एक समय ऐसा आया कि सारे के सारे शक हिन्दू हो गये, वे शैव हो गये. वे अत्यन्त विनम्र और धार्मिक हो गये. उनकी बर्बरता और क्रूरता कैसे चली गई ? किसने इनको इतना दयालु, विनम्र और धार्मिक बनाया ? रुद्र दामन, जयदामन, जीवदामन नामक शासक शक ही थे. इन विजयी अथवा पराजित शकों को शैव मत मे दीक्षित कर मानवीय गुणों से भरपूर हिन्दू बनाने का कार्य किसने किया ?

हम देखते हैं कि आक्रमणकारियों की तीसरी लहर के रूप में कुषाणों का आगमन भी भारत में हुआ था. इनका एक प्रतापी राजा कनिष्क था, कहा जाता है कि पेशावर उसकी राजधानी थी. वह क्रूर कनिष्क कैसे बौद्ध बन गया ? वह महाराजा बना हुआ शील और विनय सम्पन्न कनिष्क भिक्षा माँगते हुए एक बौद्ध भिक्षु की तरह भारत की गली-गली में घूमने लगा. सभी कुषाण वंशी लोग भारत के किसी न किसी हिन्दू-सम्प्रदाय में समा गये.

आक्रमणकारियों के चौथे प्रवाह के रूप में श्वेत हूण जाति के आक्रमणकारी लोग भी भारत में आये और उन्हीं हूणों में से मिहिरकुल और तोरमाण नामक शासक बहुत क्रूर और बर्बर थे. वही मिहिरकुल कैसे दयालु और संवेदनशील हिन्दू हो गया और कश्मीर में बस गया और शैव पंथ के विस्तार के लिये वह लग गया ?

भारत की पश्चिमी दिशा से आनेवाली इन चार बड़ी ही बर्बर, क्रूर तथा आक्रामक जातियों का हिन्दू समाज में विलीनीकरण एक ऐसी घटना है जो विश्वपरिदृश्य में दुर्लभ है. ये जातियाँ विजेता के रूप में यहाँ आई थीं. मिनियंडर, कनिष्क, रुद्रदामन, जय दामन तथा मिहिरकुल आदि सभी राजा थे. ये सभी बाहर से आये आक्रमणकारी थे किन्तु, ये सभी के सभी हिन्दू धर्म के अन्दर आनन्द से समाहित हो गये, यह ‘हिन्दू-राष्ट्र’ की दार्शनिक और सांस्कृतिक विजय थी. यह एक अद्भुत आश्चर्य था कि एक ओर सामरिक दृष्टि से हिन्दू राजा हार गये थे, उस समय की हिन्दू सेनायें भी हार गयी थीं. पाश्चात्य विचार से कहें तो हिन्दू ‘नेशन’ (Nation) पराजित हुआ, लेकिन ‘हिन्दू-राष्ट्र’ विजयी रहा. यह ‘हिन्दू-राष्ट्र’ की सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विजय थी. हिन्दू समाज के इस विशिष्ट स्वरूप को हमको ध्यान से देखना चाहिये. हिन्दू समाज के इस महाविलीनीकरण का आधार भारतीय दर्शन का ‘एकात्म-बोध’ ही था. वही ‘हिन्दू-राष्ट्र’ का ‘प्राणतत्व’ भी है.

इसी परम्परा में तेरहवीं शताब्दी का उल्लेख करना भी उचित रहेगा. असम के ऊपर थाई लोगों का आक्रमण हुआ. थाई राजा सुकफा विजयी हुआ और वह अपनी सेना के साथ असम में ही बस गया. वह असम का राजा बन गया. वह थाई देश से आया था तथा हिन्दुत्व के बारे में कुछ भी विशेष जानता नहीं था. इसकी विजय के बाद ऊपरी असम का बड़ा भू-भाग राजा सुकफा के नियंत्रण में आ गया. इसी के वंशज आगे चलकर अहोम कहलाने लगे. धीरे-धीरे कुछ ऐसा काल चक्र घूमा कि वे सभी हिन्दू हो गये. बड़े-बड़े शैव मन्दिरों के निर्माता वे हो गये. अहोम राजाओं ने असम में वेद तथा संस्कृत के अध्ययन की व्यवस्था की. असम के अन्दर सैकड़ों संस्कृत पाठशालायें खोलने की व्यवस्था उन राजाओं के द्वारा बनाई गई. यद्यपि वे लोग थाई देश से आये थे और हिन्दू दर्शन से अनभिज्ञ थे किन्तु, कौन सी विधा से उन लोगों पर ‘हिन्दू-राष्ट्र’ ने विजयी प्राप्त की? असम का पुराना स्थानीय राजा हार चुका था, पश्चिमी व्यवस्था से देखें तो कहा जा सकता है कि भारत में ‘हिन्दू-नेशन’ हारा, भारतीय राज्य हारा था. किन्तु ‘हिन्दू-राष्ट्र’ विजयी रहा.

इन सभी घटनाओं से यह बात संज्ञान में आती है कि कोई बात ऐसी अवश्य थी जो भारतीयों को वैचारिक, दार्शनिक तथा व्यावहारिक दृष्टि से श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिस्थापित करती थी तथा उन बाह्य आक्रमणकारियों को जो सैन्य शक्ति तथा युद्ध संचालन में विजयी होने के बावजूद सांस्कृतिक धरातल पर भारतीयों का अनुगामी बनाती चली गई. यह लम्बी कहानी दर्शाती है कि समय-समय पर हिन्दू का सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं दार्शनिक पक्ष विजयी रहता है. सभी के साथ समन्वय बैठाकर उनको अपने अन्दर आत्मीयता के साथ समाहित कर लेने वाली जो ‘प्रज्ञा’ है उसी को हम कहते हैं ‘सर्व-समन्वयात्मिका-प्रज्ञा’ यह ‘हिन्दू-दर्शन’ का एक विशिष्ट गुण है.

 

 

इस्लाम के सामने संघर्ष करता यह दर्शन

एक दूसरा महत्वपूर्ण अध्याय इस्लाम के आक्रमण के समय का भी है. आठवीं शताब्दी से जो मुसलमानों के आक्रमण शुरू हुये और सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी तक हम देखते हैं कि हमारे अधिकांश राजा हार गये थे. हिन्दू सत्तायें भी बहुतांश में चली गईं. लेकिन कुछ ऐसी बात अवश्य थी जो हमारे अंदर जिंदा थी, जो हमारे इस मौलिक ‘राष्ट्र-तत्व’ को जीवित रखती थी. भारी से भारी विपत्ति के काल में भी इस ‘राष्ट्र-दर्शन’ को जीवित रखा जाता था.

भारत वर्ष के उस महाविकट काल में हम एक आध्यात्मिक, दार्शनिक तथा सांस्कृतिक जागरण का कालखण्ड देखते हैं. श्री रामानुजाचार्य, स्वामी विद्यारण्य, स्वामी रामानंद, चैतन्य महाप्रभु, गुरु नानक देव, संत कबीर, बसवेश्वर, संत नामदेव, समर्थ गुरु रामदास, गोस्वामी तुलसीदास, श्रीमंत शंकरदेव आदि की बड़ी लंबी परम्परा सामने आती है. देश के हर प्रांत में हर भाषा में अध्यात्म को आधार बनाकर वैदिक दर्शन, गीता, महाभारत तथा भागवत को लेकर इस देश में अभूतपूर्व जागरण चलता रहा. वह क्या था?

उस कठिन काल में जब हिन्दू राजा हार गये थे, तब संतों का शील सम्पन्न उदात्त व्यवहार एवं उनका ‘साहित्य-दर्शन’ जिंदा था और इस ‘आध्यात्मिक-प्रवाह’ ने हार नहीं मानी थी. साधु-सन्तों के कमण्डल का जल कभी सूखा नहीं. उनके भजन, कीर्तन, प्रवचन और यात्रायें जारी रहीं. उनके झांझ, मजीरे और एक-तारे बजते रहे. और, उस महाविकट काल में भी उन्होंने राजनीतिक दृष्टि से पराजित देश के अन्दर सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक जागरण जारी रखा. वह ‘हिन्दू-राष्ट्र’ ही था जो जीवन्त था.

ग्रियर्सन और वर्नेट नाम के दो बड़े विदेशी लेखक हो गये हैं, देश के मध्यकालीन इतिहास का अध्ययन करके उन्होंने व्यापक लिखा है. वे लिखते हैं कि – उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक और पूर्व से पश्चिम भारत तक जैसे आकाश में बिजली चमक जाती है ऐसा एक प्रभावकारी और व्यापक धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन देशभर में चल रहा था किन्तु, इस विराट् भक्ति-आन्दोलन को कौन चला रहा था, यह बात समझ में नहीं आती. उनको यह हैरानी थी कि यह भक्ति-आन्दोलन कहाँ से संचालित और नियन्त्रित हो रहा था ? कौन राजा, कौन मंत्री अथवा कौन सी व्यवस्था इसको संचालित और नियंत्रित करती थी? बंधुओ! यह ‘हिंदू-राष्ट्र’ ही था और यह तब राजनीतिक पराधीनता के समय भी जीवित था.

ध्यान में रहे कि शासन के हाथ से जाने से ‘हिन्दू-’राष्ट्र’ मरा नहीं था. ‘हिंदू-राष्ट्र’ जीवित था जो कि सारे समाज को संस्कार देने के लिये बचा था. इस ‘हिन्दू-राष्ट्र’ की आत्मा पश्चिम देशों की तरह राज्य में स्थित नहीं थी. क्योंकि, वहाँ तो एक बार राज्य ध्वस्त होते ही वह नेशन (Nation) तुरन्त अपना प्राण छोड़ देता था. सात सौ-आठ सौ वर्षों के क्रूर इस्लामी शासन के बावजूद भारतीय राष्ट्र की आत्मा जीवित रही और ‘राष्ट्र-दर्शन’ ने संघर्ष जारी रखा. ‘हिन्दू-राष्ट्र’ की इस प्रकृति को समझना आवश्यक है.

अंग्रेजी शासन के विरूद्ध संघर्षरत यह राष्ट्र-दर्शन:

तीसरा जो कालखंड आता है वह अंग्रेजी शासन का काल है, उसको हम भलीभांति जानते हैं. अति संक्षप में कहें तो उस समय राजा राममोहन राय ने उपनिषदों का पुनः भाष्य लिखा. उपनिषद् अब संस्कृत के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में भी आ गये. बकिंम बाबू, स्वामी दयानन्द, महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, लोकमान्य तिलक, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, स्वामी श्रद्धानंद, मदनमोहन मालवीय, नारायण गुरु, महात्मा गांधी, बिनोवा भावे, आदि सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महापुरुषों के पीछे ‘हिन्दू-राष्ट्र-दर्शन’ ही था जो अंग्रेजों के शासन के बावजूद भी अपने अस्तित्व को बनाये हुये था. अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करनेवाला यह नेतृत्व केवल राजनीतिक ही नहीं था. वे सभी लोग सांस्कृतिक अधिष्ठान के पुरोधा थे. इस देश को राजनीतिक स्वतन्त्रता दिलाने के संकल्प के साथ-साथ देश के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक अधिष्ठान के संरक्षण के लिये भी वे दृढ़ संकल्पित थे. उन सभी ने इस आध्यात्मिक राष्ट्र को बनाये रखने के लिये सभी संभव प्रयास किये. अंग्रेजों के समय के इस काल को हम संकट का तृतीय काल भी मान सकते हैं.

अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इस राष्ट्र की यह विशेषता है कि यह अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं को खोता नहीं है. ‘हिन्दू-राष्ट्र-दर्शन’ अपना कार्य किस प्रकार करता है, इसके व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है. इसके अध्ययन से लोगों को प्रेरणा और स्फूर्ति मिलती है. स्वत्व और स्वाभिमान की अनुमति होती है. इसी कारण अंग्रेजों ने इस विषय के विस्तृत अध्ययन को कभी भी प्रोत्साहित नहीं किया. उनको इसके अध्ययन और प्रकाशन में अपना अहित दिख रहा था.

भारत के ‘राष्ट्र-दर्शन’ को लेकर एक नया विभ्रम

देश स्वतंत्र हुआ और भारत का अपना संविधान बना. डॉ. संपूर्णानंदजी बड़े विद्वान् व्यक्ति थे और उनको ‘इमोशनल नेशनल इंटीग्रेशन कमेटी’ का अध्यक्ष बनाया गया था. देश में एक ‘भावनात्मक-एकता’ का निर्माण होना चाहिये, इसको लेकर वे कार्य कर रहे थे. कमेटी के  अध्यक्ष के नाते उन्होंने अपना मन्तव्य लिखा है, वे लिखते हैं कि – ‘दुर्भाग्य है कि आज तक अपने राष्ट्र का कोई दर्शन ही निश्चित नहीं है, जब राष्ट्र का ही दर्शन नहीं तब शिक्षा का क्या दर्शन होगा?’, कैसा आश्चर्य था कि राष्ट्र का ही कोई दर्शन निश्चित नहीं हो सका. हम कौन हैं? हमारी परंपरा, हमारा इतिहास क्या है? हमारे पूर्वज कौन थे ? हमारे उद्देश्य क्या हैं? विश्व जगत को हमें क्या देना है? हमारी नियति क्या है? आदि आदि. भारत जैसे इतने प्राचीन राष्ट्र के बारे में ऐसा संभ्रम पैदा कर दिया गया जैसे कि हमारे पास स्वाभिमान करने लायक अपना कुछ भी नहीं है.

डॉ. संपूर्णानंदजी ने बहुत अच्छा वर्णन किया है कि – ‘सर्व प्रथम हमारे राष्ट्र का दर्शन तय होना चाहिये था.’ उन्होंने यह भी लिखा है ‘क्या कारण था कि जो संविधान निर्माता छोटी-छोटी बात पर व्यापक चर्चा कर रहे थे किन्तु, उन्होंने इस राष्ट्र के बारे में, तथा इसकी महान परंपराओं के बारे में चर्चा करना क्यों उचित नहीं समझा? हमने अपने ‘राष्ट्र-दर्शन’ को क्यों पुनः पारिभाषित नहीं किया? यह एक बड़ी अबूझ पहेली है.

नेशन और ‘राष्ट्र’ की संकल्पनायें

यहाँ हम थोड़ा सा फिर से चर्चा कर लें कि यह जो नेशन (Nation) शब्द है, पश्चिम से आया है, वह भारतीय ‘राष्ट्र’ का पर्यायवाची या समानार्थी नहीं है. हम राष्ट्र को नेशन नहीं मान सकते. पश्चिमी अवधारणाओं में भारतीय ‘राष्ट्र’ जैसे ‘राष्ट्र’ की कोई कल्पना ही नहीं थी और उनकी पश्चिमी मान्यताओं के अनुसार हमारा भारत एक ‘नेशन’ नहीं था. हमारा ‘राष्ट्र’ था किन्तु, पश्चिमी जगत हमारी इस ‘राष्ट्र’ धारणा को नहीं समझता था. मैक्समूलर नामक विद्वान् लिखता है कि- “Indians are a nation of philosphers and indian intellect is lacking in political and material speculation and that the Indians never knew the feeling of nationality.” {अर्थात भारत एक दार्शनिकों का देश है और भारतीय मनिषियों में राजनीतिक एवं भौतिक चिन्तन का अभाव है तथा भारतीयों में कभी भी ‘नेशनलिटी’ (Nationality) की भावना नहीं रही.}

कितना बड़ा मजाक करता है यह मैक्समूलर? वह कहता है (“Indians never knew the feeling of nationality”) भारतीय लोगों को ‘नेशनलिटी’ के बारे में कोई ज्ञान नहीं था? यह बात सच है कि मैक्समूलर जिस प्रकार का पश्चिमी ‘नेशन’ जानता था, उसको भारतीय लोग अच्छी दृष्टि से नहीं देखते थे. हमारी कल्पनाओं में तथा हमारे दर्शन के साथ वह नेशन कल्पना उचित भी नहीं बैठती थी.

हम यह ध्यान में रखें कि अपने यहाँ भारत ‘एक-राष्ट्र’ की चर्चा करने पर यह चर्चा तीन दिशाओं पर शुरू हो गई थी. प्रथमतः अंग्रेज तो यह कहते थे भारत एक नेशन (Nation) है ही नहीं. पाश्चात्य विद्वानों ने कहना शुरू कर दिया कि भारत कोई ‘नेशन’ नहीं है. इस प्रकार, एक सिद्धान्त प्रतिपादित करने का प्रयास यहाँ हुआ कि भारत एक ‘नेशन’ नहीं और भारत कभी भी एक ‘नेशन’ नहीं रहा. अंग्रेजों ने यह भी कहा कि हमने तो कभी भारत को जीता ही नहीं. भारत नाम का देश कभी हमारे सामने आया ही नहीं. अंग्रेज कहने लगे कि भारत की सेना, भारत का प्रशासन तथा भारत का कोई कानून हमने कभी देखा नहीं, जाना भी नहीं. भारत की मुद्रा क्या होती है, हम नहीं जानते. हमने तो अलग-अलग राजाओं को पराजित किया है. यहाँ पर सैकड़ों राजा और उनके राज्य थे किन्तु यहाँ भारत नाम का कोई एक राज्य हमको नहीं मिला.

अंग्रेज एक ही बात जानते थे कि उनके यहाँ जो नेशन्स (Nations) हैं वे राज्य (State) के द्वारा बनाये जाते हैं. राजा-सेना मिलकर किसी राज्य को जीत लेती है तथा वहाँ पर शासन स्थापित करती है तो एक ‘नेशन’ बन जाता है. इस प्रकार एक राजा, उसका जीता हुआ साम्राज्य तथा प्रशासन मिलकर एक नेशन बन जाता है. उनकी परिभाषाओं और मान्यताओं के अनुसार  भारत में ऐसा नहीं था और इसलिये भारत एक देश नहीं था यह धारणा उनकी पक्की हो गई थी.

दूसरी धारणा भी यहाँ पर प्रचलित की गई थी कि- भारत में बहुत सारी ‘नेशनेलिटीज’ (Nationalities) हैं. प्रत्येक भाषा बोलने वालों का वे एक पृथक नेशन मानते थे और कहते थे ये यहाँ सारे के सारे नेशंस मिलकर के एक भारत (Continent)  है और इस प्रकार यहाँ उन्होंने एक Multi National Theory प्रतिपादित की. कुल मिलाकर पाश्चात्य जगत का चिन्तन कभी भी राजा (King), राज्य (State), सेना (Army), प्रशासन (Administration) आदि भौतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं से ऊपर नहीं उठ सका. भारत के आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक ‘राष्ट्र-दर्शन’ को समझना उनको आसान नहीं था, इसकी परिभाषा करना उनके लिये बड़ा कठिन भी था.

एक तीसरी धारा और भी यहाँ चल रही थी. कुछ लोग ऐसे भी यहाँ थे जो यह मानते थे कि ‘‘भारत एक सनातन राष्ट्र है’’ तथा भारत का एक चिरंतन ‘राष्ट्र-दर्शन’ हैं. हजारों वर्षों से चला आ रहा यह ‘राष्ट्र-दर्शन’ विशिष्ट है. इन तीनों विचारों में थोड़ा-थोड़ा द्वंद्व चलता रहता था लेकिन दुर्भाग्य से इन तीनों के ऊपर कभी भी गंभीर चर्चा नहीं हुई और न कभी स्पष्टीकरण का अवसर ही आया .

पश्चिमी जगत में नेशन (Nation) का स्वरूप

पाश्चात्य जगत में नेशन के बारे में उनकी कल्पना क्या है, यह समझना आवश्यक है. पश्चिमी जगत की मान्यताओं के अनुसार जब कोई सेना किसी क्षेत्र को जीत लेती थी तथा वहाँ का शासन किसी एक राजा के हाथ में आ जाता था तब एक Nation बन जाता था. अतः राजा, सेना, प्रशासन तथा जीता हुआ राज्य किसी नेशन (Nation) के लिये आवश्यक तत्व थे. राजा और सेना ही किसी नेशन का आधार बनाती थी तथा सेना ही दूसरों के नेशन को समाप्त कर देती थी.

इस प्रकार पश्चिमी जगत में सैकड़ों नेशन्स का निर्माण हुआ तथा वे नष्ट भी हुये. उदाहरणस्वरूप एक देश के बारे में आपको बताता हूँ. मिस्र नाम का पुराना देश था या कहिये एक नेशन था. फराहों, राजाओं का यह देश था, जिन्होंने कभी पिरैमिड्स बनाये थे तथा शवों को सुरक्षित रखने के लिये ममी ;का निर्माण भी वे करते थे, रेखागणित और गणित आदि का भी उन्होंने बड़ा विकास किया था. किन्तु, एक समय ऐसा आया कि जो सेमेटिक बर्बर जातियाँ जर्मन क्षेत्र से वहाँ आईं और उन्होंने मिस्र पर कब्जा कर लिया. कहा जाता है कि पुराना मिस्र नष्ट हो गया. फिर एक दूसरा काल आया जिसमें फारस (Persia) के लोग वहाँ अपनी सेना लेकर गये, और इन पर्शियन लोगों ने इस मिस्र पर अपना अधिकार कर लिया. आगे चलकर रोम से सिकन्दर (Alexander) वहाँ अपनी सेना लेकर पहुंच गया उसने पर्शियन लोगों के द्वारा स्थापित जो एक नेशन था उसको तीसरी बार नष्ट कर दिया और यह मिस्र रोमन साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया था. बाद में मुस्लिम (अरब) आक्रमणकारी अपनी सेनायें लेकर वहाँ पहुँच गये. अरब आक्रमणकारियों ने वहाँ अपना अधिकार जमा लिया. इस प्रकार वहाँ पहुंचकर मुस्लिम शासकों ने सारे के सारे मिस्र का इस्लामीकरण कर दिया. मिस्र का यह चौथा परिवर्तन था. जब-जब राजा बदलता तब-तब सेना की शक्ति के आधार पर वहाँ एक नया राज्य स्थापित हो जाता था और उस नेशन का स्वरूप पूरा का पूरा बदल जाता था. सारांशतः फराओं राजाओं का मिस्र कभी सेमेटिक जातियों के अधिकार में चला गया, कभी वह फारसी जातियों के नियन्त्रण में चला गया, कभी सिकन्दर ने उसे जीत लिया और बाद में अरबों (मुसलमानों) ने जीता और वे उसको इस्लाम के नियन्त्रण में ले आये. फराहों राजाओं का मिस्र दोबारा कभी भी खड़ा नहीं हो सका. वह सदैव के लिये मर गया था. हर बार अपने एक नये स्वरूप में वह प्रकट होता था और अपने पुराने स्वरूप को बदल देता था. फराहो संस्कृति, फराहो विचार, फराहो परंपरा को जीवित रखने की वहाँ कोई व्यवस्था ही नहीं थी.

भारतीय संदर्भों में हम तुलना करके देखें तो ध्यान में आयेगा कि वहाँ पश्चिम जगत में भारतीय राष्ट्र जैसी कोई ‘राष्ट्रीय’ भावना नहीं थी. ‘राष्ट्र’ की दार्शनिक या आध्यात्मिक भावना जो भारत में थी, वह पश्चिम के लोगों के अन्दर नहीं थी. वहाँ राजा, सेना तथा प्रशासन ही प्रमुख था. उनकी राजा और राज्य में आत्मा बसती थी. राजा और सेना के पराजित होते ही वह देश  समाप्त हो जाता था. पश्चिमी जगत के समस्त देशों की स्थिति कम-अधिक एक जैसी ही दिखाई देती है. सेना और शासन के माध्यम से वहाँ एक नया राज्य जन्म लेता था और वह एक नया देश बना लेता था. इन सभी पुराने देशों की, चाहे वह ईरान था, ग्रीक था, रोम था, स्पार्टा था या पर्सिया (फारस) था, उन सब की कहानी कम या ज्यादा लगभग एक जैसी ही है. बाह्य आक्रमणकारी के आते ही वहाँ का देश दम तोड़ देता था.

ये सभी एक धुरी केन्द्रित देश (Monocentric Nations) हैं, अर्थात् वे एक धुरी पर चलने वाले  नेशंस हैं. ध्यान में रहे कि इनकी धुरी राज्य है. भारतीय संदर्भों के अनुसार इनको ‘राष्ट्र’ कहने से हमको कठिनाई आती है. वे हमारे जैसे ‘राष्ट्र’ का भाव नहीं जानते. भारतीय ‘राष्ट्र-भाव’ इस राज्य की शक्ति के अतिरिक्त कहीं और रहता है. भारतीय ऐतिहासिक संदर्भों में राज्य बने और बिगड़े किन्तु अन्तर्भावनाओं में ‘राष्ट्र’ का भाव समाज जीवन में बना रहता था. पश्चिमी जगत में यह ‘राष्ट्र’ का आध्यात्मिक तथा दार्शनिक भाव लुप्त था. वहाँ नेशन को ही राज्य सत्ता के रूप में देखा-सुना और व्यवहार में लाया गया था.

पश्चिमी में नेशन का आधार रिलीजन

एक समय ऐसा आया जब पश्चिमी जगत के कुछ नेशन्स एक सम्प्रदाय का आधार लेकर के चलते रहे. पश्चिमी जगत के रिलीजन शब्द को सम्प्रदाय कहने में भी हमको दिक्कत आती है. अर्थात् भारत के सभी सम्प्रदायों की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि अलग और मौलिक रूप से पश्चिम से भिन्न है- यह ध्यान में रखना आवश्यक है. अतः जब हम सम्प्रदाय कहते हैं तो भारतीय सम्प्रदाय हमारे मन में रहते हैं. जब हम रिलीजन कहते हैं तो सेमिटिक रिलीजन (Semitic Religions) हमारे मन में रहते हैं. भारत में जन्मे सम्प्रदायों तथा भारत के बाहर पाश्चात्य जगत के सभी मतों (Semitic Religions) के विचारों को समझना आवश्यक है. भारत भूमि पर उत्पन्न सभी सम्प्रदाय अन्य सभी सम्प्रदायों के प्रति सहिष्णुता तथा सम्मान का भाव रखते हैं और विश्व के समस्त नागरिकों की मंगल कामना करते हैं. भारत के बाहर जन्मे सामी मत आपस में घोर अनुदार एवं असहिष्णु हैं तथा केवल अपने ही मतानुयायियों के कल्याण की वे कामना करते हैं. उनके मत को न मानने वाले उनके विरोधी तथा शत्रुवत हैं.

पश्चिम के लोग एक नेशन में किसी एक रिलीजन को ही महत्वपूर्ण स्थान देकर चलते थे. उदाहरणस्वरूप प्रारम्भ में उन्होंने कहा कि जो जीसस (Jesus) को मानने वालों का एक साम्राज्य हो जायेगा. जीसस का साम्राज्य और वहाँ का राज्य ईसाई मत के गुरु पोप (Pope) के हाथ में रहता था. पोप ईसाइयत का प्रमुख था, वही शासन का भी प्रमुख था. ईसाइयत के विस्तार के लिये पोप ने राजसत्ता का उपयोग किया और मानवता के ऊपर भीषणतम अत्याचार किये. ईसाई देशों में जो विद्वेष फैला उसने उनके आपसी संघर्षों को और बढ़ाया. ईसाई रिलीजन के लोगों ने भी असहिष्णुता को ही बढ़ावा दिया. आगे चलकर ईसाई देश भी कैथोलिक और प्राटेस्टेण्ट के नाम से बँट गये. आगे चलकर ईसाई रिलीजन भी सारे ईसाई जगत को भी एक नहीं कर सका. सातवीं शताब्दी में इस्लाम आया और इस्लाम को मानने वालों ने कहा कि इस्लाम का खलीफा सारे विश्व में इस्लाम फैलायेगा और सारी धरती इस्लाम के नियंत्रण में आ जायेगी. एक इस्लाम का उम्मा या एक ‘नेशन’ अर्थात सारी धरती पर इस्लाम का एकराज्य स्थापित हो जायेगा. मुसलमानों के मत का प्रमुख खलीफा ही राज्य का प्रमुख माना गया. खलीफा उनके मुस्लिम सम्प्रदाय का प्रमुख था तथा राज्य सत्ता का प्रमुख भी वही था. राज्य सत्ता की शक्ति का बर्बर उपयोग इस्लाम के विस्तार में किया गया. इस्लाम की असहिष्णुता ने धरती पर कितने अत्याचार किये और कितना बँटवारा किया, यह हम जानते हैं. लेकिन इस्लाम को मानने वालों का विशाल राज्य भी टुकड़ों-टुकड़ों में बँट गया और उन राज्यों में भी भारी संघर्ष हुआ. इस्लाम को मानने वाले भी शिया और सुन्नी देशों में बंट गये. हम यह भी देखते हैं कि छोटी-छोटी बातों पर किस प्रकार इस्लाम को मानने वालों के भी अलग-अलग नेशन्स बनते चले गये. इस्लाम भी अपने मुस्लिम अनुयायियों को एकजुट बनाये रखने में सफल नहीं हुआ. सारे विश्व को एक खलीफा के नियन्त्रण में लाने का सपना देखने वाले सभी मुसलमानों को भी एक करके नहीं रख सके.

पश्चिमी नेशन का आधार भाषा

आगे चलकर यह ध्यान में आता है कि पश्चिमी जगत ने भाषा को राज्य का आधार मान लिया. भाषा को लेकर भी भारी असहिष्णुता है वहाँ. एक भाषा-भाषी दूसरी भाषा वालों को सहन करने को कभी तैयार नहीं थे. इस प्रकार प्रत्येक भाषा ने अपना-अपना छोटा-छोटा राज्य स्थापित किया. यह भाषायी असहिष्णुता, का भाव भी बहुत गहरा बैठ गया. ईसाई मत को मानने वाले स्पेन और पुर्तगाल दोनों निकट-निकट के देश हैं, लेकिन दोनों की भाषायें अलग-अलग होने से उनकी शत्रुता जगजाहिर है. भाषाई असहिष्णुता इतनी गहरी थी की स्पेनिश तथा पुर्तगाली भाषा बोलने वाले एक देश में मिलकर नहीं रह सकते थे. इस प्रकार, वे दोनों देश अलग-अलग हो गये. इंग्लैण्ड और आयरलेण्ड भी निकट के देश हैं किन्तु इन दोनों देशों की भाषायें अलग-अलग होने के कारण आज वे दो पृथक-पृथक देश हैं. जर्मन और फ्रांस को भी हम देखते हैं, दोनों देश ईसाई हैं लेकिन एक साथ नहीं रह सकते, क्योंकि दोनों को अपनी-अपनी भाषा का भारी अहंकार था. इटली, रोमानियाँ, हंगरी, बुल्गारिया, स्विटजरलैण्ड, डेनमार्क, चेक तथा स्लोवाकिया आदि देश ईसाई हैं, लेकिन वे एक साथ नहीं रह सकते. ईसाई रिलीजन इनको एक नहीं रख सका. भाषाओं की विविधताओं ने इनको अनेक बना दिया. एक-एक देश अपनी-अपनी भाषा को लेकर अलग हो गया. भाषा की पहचान तथा भाषा का स्वाभिमान, रिलीजन पर भारी पड़ा.

अपने इस अनुभव के आधार पर पश्चिमी जगत ने एक नई परिभाषा गढ़ी कि लोगों की भाषा एक अलग ‘नेशन’ का बहुत बड़ा आधार होती है. एक भाषा-भाषियों का एक पृथक नेशन होता है. अनेक भाषा-भाषी एक साथ नहीं रह सकते, यह उनका अपना अनुभव था. विविध भाषा-भाषियों को जोड़े रखने वाला ‘आध्यात्मिक-दर्शन तथा उससे निःसृत ‘एकात्मबोध’ वहाँ नहीं था. भाषा के अहंकार ने असहिष्णुता को और गहरा कर दिया. 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर एक स्वतन्त्र देश बंग्लादेश बना, वह भाषायी असहिष्णुता के कारण ही बना. पाकिस्तान ने अस्तित्व में आते ही 1947 से उर्दू को अपनी राष्ट्रभाषा स्वीकार किया था. बंग्लादेश के लोगों ने उर्दू भाषा को सीखने और बोलने से साफ मना कर दिया. उनको अपनी बंग्ला भाषा का स्वाभिमान था. उन्होंने कहा कि हम बंग्ला ही बोलेंगे तथा हमारा देश बंग्ला भाषा छोड़कर उर्दू स्वीकार नहीं करेगा, हमारा बंग्ला भाषियों का बंग्लादेश एक स्वतन्त्र देश अलग बनेगा. बड़े लम्बे संघर्ष के बाद बंग्लादेश एक पृथक देश बना. भाषाई अहंकार इस्लाम रिलीजन पर भारी पड़ गया. इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान में भी इस्लाम {अर्थात् रिलीजन का आधार} भाषाई पहचान की तुलना में कमजोर पड़ गया. भाषा देश के निर्माण में प्रमुख आधार बन गई.

इस प्रकार, हम ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के आधार पर देखें कि पश्चिमी जगत में जो ‘नेशन’ की अवधारणा रही, उसके अनुसार प्रथमतः वहाँ जो वंश था वह अपना छोटा सा राज्य बना लेता था. बाद में, रिलीजन आया और वह भी राज्य को नियन्त्रण में रखकर अपना एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करता था. आगे चलकर भाषा ने अपना प्रभाव बनाया और उसने भी भाषाई आधार पर अलग-अलग ‘राज्य’ स्थापित किये. इस प्रकार, रिलीजन अथवा भाषा के आधार पर निर्मित राज्य ही धीरे-धीरे नेशन का पर्यायवाची बन गये. किन्तु, पश्चिमी जगत के लोगों को इस बात पर बड़ा आश्चर्य था कि जिन आधारों पर नेशन निर्माण की उनकी (पश्चिमी जगत की) जो पृष्ठभूमि और कल्पना थी, वह भारत में कभी प्रभावी नहीं हुई. हमारे यहाँ एक भाषा बोलने वाला समाज एक अलग ‘राष्ट्र’ हो जायेगा, ऐसी हमारे ऋषियों की कल्पना कभी नहीं थी. लेकिन, अंग्रेजों ने जानबूझकर या अज्ञानतावश यह फैलाया कि यह देश एक नेशन नहीं है. इस कारण से भारत में ‘मल्टीनेशनल थ्योरी या ‘भारत एक उपमहाद्वीप’ की बात उन्होंने जानबूझकर के फैलाई. उन्होंने यह भी कहा कि भारत ‘गणराज्यों का एक समूह है और यह सिद्धान्त उन्होंने प्रचारित भी किया कि भारत सत्रह नेशनलटीज का नेशन समुच्च्य है.

भारत एक राष्ट्र की सनातन अवधारणा

भारत एक ‘राष्ट्र’ की हमारी सनातन अवधारणा पक्की थी. हमारे ऋषियों ने भाषाओं और बोलियों की विविधता को भेद नहीं माना. इन ऋषियों के दर्शन ने सम्प्रदाय अथवा प्रांत (राज्य) के भेद को भी कभी इतनी प्रमुखता नहीं दी जिससे वे कभी विभाजन का आधार बन सकें. इन सबसे ऊपर उनका एक दर्शन था वह दर्शन ‘एक-राष्ट्र’ का दर्शन था. उस दर्शन के माध्यम से सारा का सारा भारत कहीं न कहीं अन्तर-आत्मा से एक था. हमारे अन्दर की जो भावना थी उसने हमको लगातार एक बनाये रखा था. हमारे इस ‘राष्ट्र-दर्शन’ का आधार पश्चिम की तरह कुल-वंश, रिलीजन, सब रिलीजन, भाषा, अथवा राज्य अथवा साम्राज्य आदि कभी नहीं रहे. हमारे यहाँ ‘राष्ट्र’ के ऊपर आर्थिक तथा राज्यिक नियंत्रण, सर्वशक्तिमान पश्चिमी राजव्यवस्था की तरह कभी नहीं था. पश्चिम के लोग बोलते हैं कि ‘आप अपने को एक राष्ट्र या एक नेशन कैसे कह सकते हैं? आप अपने आपको नेशन की उस पश्चिमी परिभाषा में किस प्रकार बाँधेंगे, जिसमें कि सारा का सारा भौगोलिक क्षेत्र जिसको हम भारत कहते हैं, एक रहेगा?’ इन संदर्भों में हमारी ‘राष्ट्र’ की अवधारणा पश्चिमी विचारों से बिल्कुल अलग थी. हम मानते हैं कि हमारा ‘सनातन-राष्ट्र’ जिस दर्शन को लेकर के खड़ा हुआ है वह ही हमारा ‘राष्ट्र-दर्शन’ है, जो पश्चिम की धारणाओं तथा मान्यताओं से सर्वथा भिन्न है. हमारे ‘राष्ट्र’ की जो भावना है॰ वह ‘दार्शनिक’ और आध्यात्मिक है. यही भावना सारे ‘राष्ट्रीय-तत्वों’ को एक करती है.

राष्ट्र-दर्शन’ की वैदिक और सनातन अवधारणा

हमारे समक्ष बड़ा प्रश्न है कि ‘राष्ट्र’ का अर्थ क्या है? भारतीय संदर्भों में इस ‘राष्ट्र’ से क्या भाव प्रकट होते हैं? ‘राष्ट्र’ के उद्भव के बारे में हमारे ऋषियों ने बहुत स्पष्टता के साथ वर्णन किया है. प्रथम द्रष्ट्या यह ध्यान में रखना है कि ‘राष्ट्र’ का अर्थ राज्य से ऊपर है. हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले ही ‘राष्ट्र’ की एक बड़ी ‘दार्शनिक आधारशिला’ रखी थी. वह आधारशिला ऋषियों की ‘भद्र-इच्छा’ के कारण से बनी है. हमारे ऋषियों की ‘लोक-मंगलकारी-इच्छा’ के जो चार प्रमुख सूत्र प्रकट हुये हैं, (जिनकी चर्चा हम पूर्व में कर चुके हैं) वे ही हमारे भारतीय राष्ट्र दर्शन के आधार बन गये. पश्चिमी जगत की तरह वह स्वयं का तथा अपने ही किसी विशिष्ट समूह का ही हित चिन्तन करनेवाले नितान्त स्वार्थी लोगों के द्वारा दिये गये सिद्धान्त नहीं हैं.

भारतीय दर्शन के अनुसार महान् तत्वदर्शी लोगों की ‘लोक-कल्याणकारी-इच्छा’ से राष्ट्र का निर्माण होता है. यह उन लोगों की साधना से निर्माण होता है जो लोग इस ‘राष्ट्र-तत्व’ में दीक्षित हैं, इस ‘राष्ट्र-तत्व’ के प्रति जिनका समर्पण है तथा जिनका ‘विश्व-कल्याण’ का संकल्प है, वे ही एक ऐसे ‘राष्ट्र’ का निर्माण कर सकते हैं. यह ‘राष्ट्र’ किसी राजनीतिक तन्त्र से विकसित हुआ तन्त्र नहीं है. यह ‘राष्ट्र का तन्त्र’ किसी ‘आर्थिक-तन्त्र’ से विकसित हुआ तन्त्र नहीं है, और न  किसी पंथ या भाषा जैसे मुद्दों को लेकर चलाये गये किसी अभियान से उत्पन्न हुआ यह ‘राष्ट्र’ है.

अथर्ववेद में जब ऋषि ‘राष्ट्र’ के उद्भव और विकास के बारे में बोलते हैं, तब राष्ट्र के बारे में वे कल्पना करते हैं, वह ध्यान देने योग्य है. उनके भावों के अनुसार यह ‘राष्ट्र-तत्व’ सारी राज्य व्यवस्थाओं, सारी भाषाओं तथा सभी सम्प्रदायों के भावों से ऊपर है. इस ‘राष्ट्र-भाव’ का निर्माण कैसे होता है तथा इस ‘राष्ट्र-भाव’ के लिये क्या करना पड़ता है, इसके लिए अथर्ववेद के उस सूक्त में, ऋषियों ने बहुत सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है, भारतीय ‘राष्ट्र-दर्शन’ को समझने के लिये उसका मनन करना आवश्यक है.  वे कहते हैं:-

‘भ्रदं इच्छन्त ऋषयः स्वर्विदः तपो दीक्षां उपनिषेदुरग्रे.

ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातं तदस्मै देवा उपसन्नमन्तु..’ (अथर्ववेद 19.41.1)

अर्थात् ‘ऋषियों के अन्दर एक ‘भद्र-इच्छा’ प्रकट हुई. ऋषियों की इस ‘भद्र-इच्छा’ का अर्थ है ‘लोक-मंगलकारी’ इच्छा. सभी के आनन्द की कामना करने वाली इच्छा. वे ऋषि लोग ‘स्वर्विदः अर्थात् ज्ञानी थे. ‘तपो दीक्षां’ अर्थात् उन्होंने ‘दीक्षा’ भी पाई थी. भाव यह है कि ‘राष्ट्र’ की लोकमंगलकारी एवं वैचारिक अवधारणा के साथ वे दीक्षित थे. इस दीक्षा के कारण वे दृढ़-संकल्पित थे और उन्होंने तप किया. यह तप क्या है? यह तप है, अपनी भावनाओं को समाज में गहरे नीचे ले जाने हेतु किया गया कठोर परिश्रम. इन भावनाओं को तो उन्होंने अपनी एक झोंपड़ी अथवा आश्रम में बैठकर साक्षात् (अनुभूत) कर लिया था, लेकिन इतना भर पर्याप्त नहीं था. ये भावनायें दूरस्थ गांवों में स्थित निवासियों के हृदय तक किस प्रकार पहुँचेंगी ? इसके लिये कठोर परिश्रम की आवश्यकता थी. यह बात थी हजारों वर्ष पूर्व की. ऋषियों की इस साधना के कारण से ही -‘ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातं’ – अर्थात् ‘राष्ट्र’ में बल आ गया, ‘राष्ट्र’ में तेजस्विता आ गई. यह ‘राष्ट्र’ तेजस्वी बना, ऋषियों की इस ‘दीक्षा’ के कारण, उनके ‘तप’ के कारण तथा उन ऋषियों की ‘भद्र-इच्छाओं’ के कारण. ऋषि कहते हैं कि -‘तद्स्स्मै देवा उपसन्न मन्तु’ अर्थात्- आइये हम सब मिलकर इस ‘राष्ट्र-भाव’ की उपासना करें, इस ‘राष्ट्र-भाव’ का अभिनंदन करें, इस ‘राष्ट्र-दर्शन’ की सेवा करें, इस ‘राष्ट्र’ को प्रणाम करें, और इस ‘राष्ट्र’ के प्रति समर्पित हों.

भारत में विकसित यह ‘राष्ट्र’ एक ‘दार्शनिक संकल्पना’ है, एक ‘वैचारिक-अवधारणा’ है जिसको लेकर ये ऋषि उपस्थित हुये थे. इन ऋषियों की जो ‘भद्र-इच्छायें’ थीं उन ‘भद्र-इच्छाओं’ के प्रकाश में चलते हुये इन ऋषियों का यह ‘एकात्म-राष्ट्र-दर्शन’ आगे बढ़ता चला गया.

भद्र-इच्छाओं की सार्वजनिक स्वीकृति

इन ‘भद्र-इच्छाओं’ में निहित था एक ‘सर्वजन-मंगलकारी-दर्शन’. अर्थात् अपने कारण किसी को भी लेशमात्र भी दुःख या कष्ट न हो. ऋषियों की इन ‘भद्र-इच्छाओं’ का यह भाव-सन्देश भारतवर्ष के जन-जीवन में नीचे तक चला गया. राजाओं-महाराजाओं, विद्वानों-निरक्षरों, धनवानों-निर्धनों, ग्रामवासियों-नगर-वासियों आदि सभी ने इसको स्वीकारा. इसके अन्दर सर्वाधिक महत्वपूर्ण था एकात्म बोध. यह एकात्म बोध ईश्वर की सर्वत्र व्याप्ति के कारण उत्पन्न होता था, धरती को माता मानने के कारण उत्पन्न होता था अथवा स्वयं को विराट् पुरुष का एक अंग मानने के कारण उत्पन्न हुआ था. किन्तु, स्मरणीय यह है कि यह ‘एकात्मबोध’ भारतीय-दर्शन की सर्वाधिक मूल्यवान बात थी.

यह सच है कि विविधतायें संघर्ष उत्पन्न करने का आधार प्रस्तुत करती हैं किन्तु, सर्वत्र सभी के अन्दर विराजमान ईश्वरानुभूति ने समय-समय पर उत्पन्न होनेवाले संघर्षों के समाधन की आधारशिला रख दी थी. ऋषियों ने सभी प्रकार की विविधताओं को सम्मानित करते हुए इस राष्ट्र को एक ‘महाधिकार पत्र’ प्रदान करते हुए कहा -‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’. यह एक मन्त्र अनन्त विविधताओं को स्वीकार किये जाने का एक ‘महाधिकार’ पत्र बन गया था. इस एक मंत्र ने सबको एकसूत्र में बाँधने की बड़ी विचित्र साधना की है. ऋषियों के इस वैश्विक दर्शन ने सभी को असीमित रूप से उदार बना दिया.

भद्र-इच्छाओं के विपरीत कोई नहीं गया

हमारे राष्ट्र की एक महत्वपूर्ण एवं आश्चर्यजनक बात यह भी रही कि इस देश में कभी भी कोई व्यक्ति या समूह इन ‘भद्र-इच्छाओं’ के विरुद्ध कभी खड़ा नहीं हुआ. क्या किसी पंथ ने घोषणा की कि मनुष्य-मनुष्य में भेद होता है और हम ‘समानं सर्वभूतेषु’ को नहीं मानते. सभी पंथों तथा श्रेष्ठ विचारों के शीर्षस्थ लोगों ने सभी मनुष्यों को उनके ईश्वरीय भावों के कारण ही समान माना. क्या इन ‘भद्र-निर्देशों’ के विरोध में आज तक कोई सम्प्रदाय खड़ा हुआ? क्या इस देश में कोई भी ऐसा पंथ या सम्प्रदाय सामने आया जो यह घोषणा करता हो कि हम – ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ को नहीं मानते? अथवा हम ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ की अवधारणा से अपना मत भिन्न रखते हैं ? क्या कभी कोई ऐसा विचार इस देश में सामने आया जो कहता हो कि हम – ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ को नहीं मानते ? नहीं, कभी नहीं आया. इस देश में जितने भी पंथ पैदा हुए उन पंथों की पहली शर्त यह थी कि ऋषियों की इन ‘भ्रद-इच्छाओं’ के साथ वह अपने आपको एकरूप करें. आश्चर्य की बात यह रही कि इस देश में उत्पन्न प्रत्येक पंथ या सम्प्रदाय अपने आपको इन ‘भद्र-इच्छाओं’ के अनुरूप ही सिद्ध करने की कोशिश करता था. इन मौलिक सिद्धान्तों से दूर जाने की बात तो कभी कोई विचार भी नहीं कर सकता था. यह इस राष्ट्र की मौलिक एकता का प्रबलतम आधार रहा.

भद्र-इच्छाओं तथा भद्र-दृष्टि ने एक पात्र का रूप ले लिया

जब हम ‘हिन्दू-संस्कृति’ की विशेषताओं के बारे में चर्चा करते हैं तो ध्यान में आता है कि ये ‘भद्र-इच्छा’ एवं ‘भद्र-दृष्टि’, ‘लोक-मंगलकारी-इच्छा’ तथा ‘लोक-मंगलकारी-दृष्टि’ एक कलश (पात्र) बनाती है. यह ‘भारतीय-दर्शन’ का (हिन्दू-दर्शन का) एक बर्तन बनाती है. इस पात्र में प्रत्येक पंथ, प्रत्येक सम्प्रदाय अपनी-अपनी विशेषताओं को लेकर बैठ जाता है. अपने देश के सभी पंथों एवं सम्प्रदायों का यह सर्वजन-स्वीकृत-पात्र एकसा है, यह पात्र दार्शनिक दृष्टि से एकरूप है. इस पात्र की एकरूपता ‘दर्शन’ की है. इस पात्र के अन्दर बैठे हुए विविध सम्प्रदाय, पंथ, उपपंथ आदि अनेक हैं. अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ वे सभी उस कलश के अन्दर अवस्थित हो जाते हैं. कलश की दार्शनिक परिधि के बाहर जाने का प्रयास भारत के किसी पंथ ने आज तक नहीं किया. यह एक व्यापक एवं सार्वजनीन स्वीकृति थी.

इस प्रकार, हम देखते हैं कि ये विविध पंथ, उपपंथ तथा संप्रदाय आदि अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ समान आदर्शों के दर्शन का आकार ग्रहण कर लेते हैं. यही इन सभी की अन्तर्भुक्त समानता का बड़ा भारी कारण है. भारत की सांस्कृतिक विशेषता का यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है जो स्वयंदीप्त है. इस दर्शन को लेकर भारत के ऋषियों ने और अन्य महापुरुषों ने एक ‘अध्यात्मभाव’ विकसित किया और उसको वे सारे क्षेत्र में दूर गाँवों तक ले गये. उन ऋषियों की लोकसाधना से यह ‘लोकमंगलकारी-दर्शन’ समाज के सभी वर्गों में व्याप्त हो गया. यह दर्शन और व्यवहार किस प्रकार दूरस्थ स्थानों तक पहुँच गया इसका एक उदाहरण देखिये-

असम (गुवाहाटी) में एक वनवासी सम्मेलन था जिसमें वहाँ की 42 जनजातियों के सैकड़ों लोग आये थे. सम्मेलन में उपस्थित लोगों से कुछ प्रश्न वहाँ के कार्यकर्ताओं ने पूछे. उन्होंने पूछा कि ‘धरती’ के बारे में आपकी धारणा क्या है? उन सभी जनजातियों ने कहा कि ‘धरती’ को हम पवित्र मानते हैं. ‘धरती’ की हम पूजा करते हैं. धरती हम सभी की माँ है. यद्यपि वे जन-जातियाँ कोई वैदिक मंत्र नहीं जानती थीं. दूसरा प्रश्न उनसे पूछा गया कि आप अपनी ‘प्रार्थना’ में प्रभु से क्या माँगते हैं?’ उन्होंने कहा ‘हम अपनी पूजा में सबके भले की कामना करते हैं, अपने गाँव, अपने परिवार के साथ-साथ गाँव के सभी लोगों के भले की कामना और धरती के सभी लोगों तथा धरती के सभी जीवों के सुखी जीवन की हम कामना करते हैं.’ तीसरा प्रश्न उनसे पूछा कि-‘आप अपनी जनजाति से भिन्न किसी दूसरी तथा अन्य जनजाति की पूजा-पद्धति की आलोचना अथवा निन्दा करते हैं क्या? या आप यह कहते हैं कि दूसरी पूजा-पद्धति वाले व्यक्ति भी हमारी पूजा-पद्धति के साथ आ जायें ? उन सभी जनजाति के लोगों ने कहा- ‘नहीं हम ऐसा कभी नहीं करते.’ हम सभी की पूजा-पद्धतियों को अच्छा मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं. हम लोगों के लिये यह आश्चर्यजनक था. एक भी उदाहरण ऐसा ध्यान में नहीं आता जब उत्तर-पूर्वांचल की 222 जनजातियों में से एक भी जनजाति किसी दूसरी जनजाति की पूजा-पद्धति की आलोचना अथवा निन्दा करती हो अथवा उसकी बुराई करती हो या उनको हेय मानती हो या अन्य पूजा-पद्धति वालों को अपनी पूजा पद्धति में लाने का प्रयास करती हो. निष्कर्ष यह निकलता है कि दूरस्थ स्थानों पर बसी जनजातियों के मन में भी वही सनातन दर्शन कैसा सुन्दर ढंग से विराजमान है. क्या यह आश्चर्य और आनन्द की बात नहीं है? ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ तथा ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ के सिद्धान्त अपने व्यवहार का आदर्श लेकर समाज में कितने गहरे बैठे हुये हैं? यहाँ यह भी समझने की बात है कि सभी के सुख की कामना, सभी पूजा-पद्धतियों का सम्मान तथा समस्त पृथ्वी के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति का भाव कितनी दूर तक चला गया है. यह ऋषियों के तप से ही संभव हुआ होगा.

भारतीय-राष्ट्र-दर्शन का व्यापक विस्तार

हमारे ऋषियों तथा आध्यात्मिक महापुरुषों ने अनेक ग्रंथों और विपुल साहित्य की रचना के द्वारा राष्ट्र के इस दार्शनिक भाव को दृढ़ता से प्रतिस्थापित किया है. हमारे देश में विकसित सम्प्रदायों, पंथों और विविध पूजा-पद्धितियों ने भी इसी भाव को आगे बढ़ाया. हमारे तीर्थों तथा तीर्थ-यात्राओं ने, देश के शास्त्रों तथा महापुरुषों के प्रवचनों ने इसी भाव को आगे विस्तारित किया है. स्मरण में रखने की बात यह है कि इस देश का साहित्य, कला, संगीत, पूजा-पाठ, गीत, कवितायें, नाटक, विविध पर्व तथा उत्सवों आदि सभी की रचना भारतीय दर्शन के इन मौलिक तथा आधारभूत भावों के अनुकूल ही होती आ रही है.

राष्ट्र-दर्शन के संरक्षण और विस्तार में संस्कृत का योगदान

संस्कृत भाषा ने भी इसी दिशा में बहुत बड़ा काम किया. सभी प्राचीन भारतीय ग्रन्थ यथा वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, व्याकरण तथा ज्योतिष आदि के ग्रन्थ संस्कृत में ही सारे देश में ख्याति प्राप्त करते गये. यद्यपि जैन तथा बौद्ध ग्रन्थ प्रारंभ में तो प्राकृत और पाली भाषा में थे किन्तु, आगे चलकर वहाँ भी ग्रन्थ रचना संस्कृत में ही होने लगी थी. संस्कृत भाषा ने सारे देश में विविध प्रसंगों के मंत्रों की एकरूपता को बनाये रखा और हमारे दर्शन की विशिष्टता को वे सभी के सामने श्रद्धापूर्ण वातावरण में उच्चारित करते रहे. डॉ. सम्पूर्णानन्द जी को कुछ लोगों ने परामर्श दिया कि ये जो संस्कृत के मंत्र हैं इनको लोक-भाषाओं में अनुवादित कर दिया जाये तो ठीक रहेगा. डॉ. सम्पूर्णानन्द जी ने ऐसा करने से मना किया और कहा- ऐसा मत करिये. आप इन मन्त्रों का अर्थ जानते हैं, या नहीं जानते इस बात को छोड़ दीजिये. ये मंत्र संस्कृत में हैं और बीसियों हजार सालों से लोग इन मन्त्रों को शुद्धरूप में आज तक ले करके आये हैं. इनको बदलने की कोशिश हम लोग न करें. हमारी संस्कृत भाषा ने इन मन्त्रों के सहारे कैसे सबको एक बना करके रखा है यह विश्व पटल पर बहुत ही अद्भुत बात है. इसी में इनकी पवित्रता है. हमारे देश को ये मन्त्र दार्शनिक स्तर पर बाँधे रखते हैं.

जैसा कि पहले कहा गया था कि प्रत्येक समाज की एक विशिष्ट पहचान होती है जिसको लेकर वह जीता है और विश्व के लिये भी वही उसकी एक अनमोल धरोहर हो सकती है. भारत भी एक विशिष्ट पहचान को लेकर हजारों वर्षों से चल रहा है. भारत के वैभव के दिन रहे हों या भीषणतम संकटकाल रहा हो- भारत ने अपनी उस पहचान को सुरक्षित बनाये रखने के प्रयास जारी रखे हैं. वह पहचान है‘-हिन्दू-दर्शन’.

‘हिन्दू-दर्शन’ जब सम्मान के साथ लोगों के मन में स्थान बना लेता है तब वह ‘हिन्दुत्व’ हो जाता है. यही ‘हिन्दू-दर्शन’ जब उनके जीवन के हर पहलू में प्रकट होता है तब वही दर्शन ‘हिन्दू-संस्कृति’ का रूप धर लेता है. इसी ‘हिन्दू-संस्कृति’ के पवित्र प्रवाह में रचा-बसा समाज एक वैचारिक एवं व्यावहारिक जीवन दर्शन के साथ सम्पूर्ण समाज को साथ लेकर चलता रहता है. अपने ऋषियों की ‘भद्र-इच्छाओं’ के अनुरूप संकल्पित यह समाज विश्व के प्रति अपने जागतिक दायित्व को अनुभव करता है, यही ‘हिन्दू-राष्ट्र’ है. इसको बनाना नहीं है, यह तो शाश्वत है, चिरंतन है, सनातन है, नित्य नूतन है तथा विश्व की प्रत्येक कठिनाई और कष्ट को अनुभव करते हुए इस पृथ्वी पर अवतरित है. इसका साक्षात् और गौरव सभी को हो और आत्मानुभूति से प्रेरित ऋषियों के वंशज स्वाभिमान एवं कर्तव्य बोध के साथ विश्वपटल पर पुनः गुंजारित कर उठें ‘संस्कृति र्विश्ववारा..’ तथा ‘माताभूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या..’ इस देवभूमि के पुत्रों का कर्तव्य है कि – ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का उद्घोष जारी रहे. ‘हिन्दू-राष्ट्र’ का विश्व को यही सन्देश है, यही उसका कर्तव्य है और यही उसकी नियति भी है.

‘हिन्दू-संस्कृति’ की कुछ विशिष्ट विशेषतायें

हमारा ‘हिन्दू-दर्शन तथा उससे उत्पन्न ‘हिन्दू-संस्कृति’ एक विशिष्ट व्यवहार को लेकर विश्व पटल पर उभरी है. यह विशेषता उसको विश्व के अन्य सभी समाजों और विचारों से एक अलग स्थान देती है. उसमें से कुछ ध्यान देने योग्य बिन्दुओं को एक बार संक्षेप में स्मरण करते हैं:

1.    किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रदत्त दर्शन यह नहीं है: विश्व में उपस्थित अन्य विचारों एवं दर्शनों से भिन्न यह जो विचार-दर्शन है वह किसी एक व्यक्ति या किसी व्यक्ति-संघ के द्वारा प्रारम्भ किया हुआ या किसी एक विशिष्ट ग्रंथ या पंथ द्वारा सम्पादित या संचालित यह दर्शन नहीं है.

2. दर्शन, संस्कृति और जीवन अविछिन्न हैं: हमारे इस दर्शन में ‘हिन्दू-दर्शन’, ‘हिन्दू-संस्कृति’ और ‘हिन्दू-जीवन’ तीनों अविछिन्न हैं तथा तीनों ही साथ-साथ हैं. इन तीनों में से एक भी यदि अलग हट जायेगा तो यह सारा खेल बिगड़ जायेगा. इसमें तीनों को ही सामूहिक रूप से लेकर के चलना है.

3. सर्वजन-समन्वय का भव्य राजमार्ग: ‘हिन्दू-दर्शन’ में ‘सर्वजन-समन्वय’ की बड़ी महत्ता है. हिन्दुओं के पास ‘सर्व-समन्वयात्मिका-प्रज्ञा’ नामक अमूल्य ऐसी ‘मणि’ है जो कितने भी विरोधाभासों में समन्वय के सूत्र ढूँढने का प्रयास सदैव जारी रखती है. कितनी भी विपरीत परिस्थिति आने के बाद भी हिन्दू मन अन्ततोगत्वा आपसी समन्वय के लिये ही निरन्तर प्रयत्नशील और गतिशील बना रहता है. हमारे ऋषियों ने तथा हमारे महापुरुषों ने कितने भी संघर्षों के बाद आपसी समन्वय का मार्ग हमेशा ढूँढ़कर के निकालने की कोशिशें जारी रखीं और इससे वे कभी दूर नहीं गये. हम कह सकते हैं कि हमारा यह ‘सर्वजन-समन्वय-भाव’ हिन्दू संस्कृति के इतिहास का एक विलक्षण और ‘भव्य राजमार्ग’ है. इस राजमार्ग को छोड़कर के हिन्दुत्व कभी नहीं चल सकता. समन्वय का यह मार्ग छोड़ते ही पश्चिम की असहिष्णुता आ घेरेगी.

4. धर्म का महाधिकार पत्र: ‘सर्वजन-स्वीकृति’ का हिन्दुओं का यह सिद्धान्त धर्म का ‘महाधिकार-पत्र’ कहा जा सकता है. अर्थात् कोई भी सम्प्रदाय, कोई भी दर्शन इस ‘महाधिकार-पत्र’ के साथ हमारी संस्कृति के साथ एकरूप हो सकता है और इस देश में अथवा हिन्दुओं के साथ विश्व में कहीं भी आनन्द से रह सकता है. हम कह सकते हैं कि हमारी ऋषि परम्परा का और भारतीय दार्शनिकों के ‘एकात्मबोध’ का यह ‘एकात्म-सूत्र’ है.

5. हिन्दुओं की स्वीकार्यता असीम है: अपने इस दैवीय समन्वयी-भाव के कारण, किसी भी बाह्य व्यक्ति या विचार के प्रति हिन्दू की स्वीकार्यता असीम है. यह स्वीकार्यता इतनी बड़ी है और ऋषियों से प्राप्त उनका ‘बहुधा’ का जो आंगन है वह इतना विस्तीर्ण है कि उसमें हजारों विचारों एवं दर्शनों को समेटने का अद्भुत सामर्थ्य है. हिन्दुओं की ‘एकम्’ की ‘दृष्टि’ और ‘बहुधा’ के आंगन ने हिन्दू के हृदय में स्वीकार्यता के इस भाव को बहुत विशाल बना दिया है. जैसे जंगल में हजारों प्रकार के वृक्ष, लता पौधे तथा विविध वनस्पतियाँ पैदा होती हैं, फूलती हैं और फलती हैं तथा अपनी-अपनी क्षमता से विस्तार भी पाती हैं, उसी प्रकार इस ‘बहुधा’ के प्रांगण ने हजारों मतों और पंथों को अपने अन्दर ही फलने-फूलने का स्वतन्त्र अवसर दिया है.

6. हिन्दुओं का एकात्मभाव बहुत्व का विरोधी नहीं: हिन्दुओं के एकात्मभाव’ में अन्तर्निहित जो ‘एकत्व’ है, वह किसी भी प्रकार से ‘अनेकत्व’ या ‘बहुत्व’ अर्थात् बहुलतावादी विचारों और परम्पराओं का विरोधी या विनाशक नहीं है. जैसे कि पश्चिमी जगत में बहुत्व को समाप्त करके ही वहाँ एकरूपता की स्थापना के प्रयास हुये. हमारा ही मत सच है और इसी को आप मानिये ऐसा दुराग्रह करते हुए उन्होंने मानवता पर भीषण अत्याचार किये और सैकड़ों परंपराओं की ‘बहुलता’ को बर्बरता से नष्ट कर दिया. किन्तु, हिन्दुओं का ‘एकत्व’ और ‘बहुत्व’ साथ-साथ चलता है. विश्व की हजारों परम्परायें अपनी बहुलताओं के साथ मिलकर चल सकती हैं. यही हिन्दुत्व का सौन्दर्य है.

7. मोक्ष की साधना हेतु व्यापक स्वातन्त्रता: हम कह सकते हैं कि हिन्दुओं ने समस्त मानव समाज के लिये ‘सत्य-दर्शन’ अर्थात ईश्वर की प्राप्ति और मोक्ष की साधना हेतु व्यापक स्वतंत्रता दी है. ‘सत्य-दर्शन’ के लिये दी गयी यह स्वतंत्रता -धार्मिक है, सामाजिक है, एवं व्यक्तिगत है. प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने विचार, स्वभाव, प्रकृति के अनुसार अपना-अपना स्वतन्त्र मार्ग साधिकार तय कर सकता है.

8. चैतन्य और जड़ के मध्य समन्वय: अनुभव के आधार पर हिन्दुओं ने ‘निश्श्रेयस’ और ‘समुत्कर्ष’ (इन दोनों) का तालमेल ‘हिन्दू-संस्कृति’ में बहुत ही सुन्दर और वैज्ञानिक ढंग से बिठाया है. वैदिक ऋषियों के समय से ही एक ओर ‘चैतन्य’ की साधना और दूसरी ओर ‘जड़’ (भौतिक संसाधनों) की कभी उपेक्षा भी नहीं. जो ‘जड़’ है अर्थात् भौतिक है, उसके साथ-साथ कैसे हम लोग ‘निश्श्रेयस’ की साधना कर सकते हैं, ‘हिन्दू-संस्कृति’ ने इसका सुन्दर सामंजस्य बनाकर रखा है.

09. अपने लोगों के बाड़े नहीं बनाये: ‘हिन्दू-धर्म-संस्कृति’ के उपासकों ने अपने चारों तरफ एक बाड़ा बना करके अपने विचार के लोगों को शेष अन्य लोगों से दूरी बनाकर नहीं रखा. ये जो बाड़े में अथवा घेरे में लोग हैं, वे ही हमारे हैं तथा हमारे घेरे के बाहर के जो लोग हैं वे बिराने और हमारे नहीं, वे हमारे विराधी या शत्रु हैं, ऐसा हम लोगों ने कभी नहीं सोचा. ऐसे विभाजनकारी अथवा विभेदकारी विचारों को भारत में कभी भी मान्यता नहीं मिली.

10. धार्मिकता ही सर्वपंथ-समादर भाव का आधार है: हिन्दुओं के धार्मिक भाव को समझना आवश्यक है. हमारा हिन्दू धर्म धार्मिक है इसीलिये हम (तथाकथित) धर्मनिपेक्षता और सेक्युलरिज्म की बात बोलते हैं और इसको अपने व्यवहार में जीते भी हैं. हमारे इस ‘सर्व-पंथ-समादर-भाव’ का आधार हमारी ‘धार्मिकता’ ही है. हमारी धर्मनिरपेक्षता या सेक्युलरिज्म (या पंथनिरपेक्षता) किसी राजनीतिक अवसरवादिता या राजनीतिक निर्णय का आधार ले करके खड़ी नहीं हुई. ऐसे अनेक प्रसंग आये जब हमारे देश में किसी विशेष मत को मानने वालों के पास प्रबल राजनीतिक शक्ति थी तब भी हम लोगों ने अपने ‘राष्ट्र-दर्शन’ के अनुरूप ‘सर्वपंथ-समन्वय-समादर-भाव’ को सदैव जाग्रत रखा.

11. जिज्ञासा, प्रश्न, शंका, चर्चा,-वार्ता, का सम्मान: यह ‘हिन्दू-धर्म-दर्शन’, पश्चिमी जगत के सेमेटिक पंथों की तरह केवल विश्वास या मान्यता के आधार पर चलने वाला नहीं है. हिन्दुओं ने वैदिक काल से ही लोगों को जिज्ञासा, शंका प्रश्न और स्वतंत्र चिन्तन की पूरी छूट दी है. हिन्दुओं ने चर्चा-वार्ता और तर्क की परंपरा को सदैव सम्मान दिया. हिन्दुओं ने तर्क के महत्व को न केवल स्वीकार किया वरन् तर्क के जो भी निष्कर्ष निकले उनको बौद्धिक शुचिता के आधार पर स्वीकार करने में आनन्द का अनुभव किया.

12. राजनीति केन्द्र बिन्दु नहीं है: हिन्दुओं के दर्शन का जो केन्द्र बिंदु (आधार) है वह हमारी राजनीतिक शक्ति के ऊपर आधारित नहीं है. जो केवल किसी विशेष पंथ या किसी विश्वास के आधार पर फले, फूले और विकसित हुये हैं, वे लोग राजनीति और रिलीजन इन दोनों का प्रयोग करने से बच नहीं पाते. हमारा धर्म, धर्म पर आधारित है. हमारा धर्म एक दर्शन के ऊपर आधारित होने से सम्प्रदाय विस्तार के लिये राजनीति या राजसत्ता का प्रयोग तथा राज्यसत्ता के विस्तार में सम्प्रदाय का उपयोग हम लोगों ने कभी नहीं किया. ईसाई तथा इस्लाम के अनुयायियों ने यह संयम कभी नहीं रखा.

13. हिन्दू-संस्कृति राज्यसत्ताओं की चेरी नहीं है: ‘हिन्दू-संस्कृति’ राजसत्ताओं की अनुगामिनी कभी नहीं रही. हिन्दू-संस्कृति बार-बार इस ओर प्रेरित करती है कि राजसत्ता, समाज की कम से कम बातों पर नियंत्रण करे. राजसत्ता मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर अपना नियन्त्रण करके बैठ जाये यह अधिकार हम लोगों ने उन बड़े-बड़े महाराजाओं को भी कभी नहीं दिया.

14. लौकिक विजय के स्थान पर आत्मिक-विजय: ‘हिन्दू-धर्म’ तथा ‘हिन्दू-संस्कृति’ लौकिक (भौतिक अथवा सामरिक) विजय के स्थान पर सदैव आध्यात्मिक और आत्मिक विजय को ही महत्व प्रदान करती है. भौतिक सम्पदा, भौतिक साम्राज्य अथवा बौद्धिक सम्पदा की प्राप्ति से हमको अभीष्ट अनन्त सन्तुष्टि कभी नहीं होती. हिन्दू समाज की जो सन्तुष्टि और तृप्ति है, वह बौद्धिक और भौतिक जगत की चकाचैंध से संतृप्त होने वाली नहीं. हम लोगों ने मनुष्य की ‘ऊर्ध्व-गति’ और आध्यामिक साधना को ही सर्वश्रेष्ठ माना और इसी को महत्व दिया.

15. धर्म जीवन के लिये और जीवन धर्म के लिये: हमारे यहाँ ‘धर्म’ और ‘जीवन’ का सामंजस्य सदा बना रहे यह बड़ा आवश्यक था. हिन्दुओं के लिये मानव जीवन का उद्देश्य सदैव स्पष्ट रहा. मानव जीवन एक ईश्वरीय वरदान है और यह पुण्य कार्यों के लिये ही है अर्थात् ‘धर्म जीवन के लिये है’ और यह ‘जीवन धर्म के लिये’ है, यह वाक्य ‘हिन्दू-संस्कृति’ में सभी युगों में सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित रहा है. जीवन की सफलता भौतिक वस्तुओं के संग्रह के बजाय उनसे निवृत्ति में ही रही.

16. नित्य-धर्म-तत्वों का प्रतिक्षण स्मरण: हिन्दुओं ने अपने जीवन में कुछ शाश्वत ‘नित्य-धर्म-तत्वों’ को स्वीकार किया है. हमारे लिये जो ‘नित्य-धर्म-तत्व’ हैं, उनका हम प्रतिदिन स्मरण करते हैं. जो सर्वोपरि हैं वह चाहे चैतन्य का रूप है, चाहे वह सत्य है, चाहे वह धर्म है, चाहे वह ऋत है अथवा ब्रह्म है उसका प्रतिक्षण स्मरण करते हुए अपने जीवन के प्रत्येक आयाम को जीना. इसका प्रकट भाव है जीवन में शुचिता, पवित्रता, मर्यादा और मूल्यों का संरक्षण. हिन्दू धर्म का पालन करने वालों ने इनको सदैव अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान पर रखा है तथा इनके साथ समझौता कभी भी नहीं किया. वैदिक ऋषियों से ले करके स्वामी विवेकानन्द और महात्मा गाँधी तक हम देखें कि उन्होंने ऋत, सत्य, धर्म, ब्रह्म, चैतन्य आदि की महत्ता को लगातार और निरन्तर बनाये रखा. यद्यपि, हिन्दू समाज के ऊपर हजारों वर्षों के कालप्रवाह में अनेक प्रकार के संकट सामने आये. यहाँ तक कि, प्राण-संरक्षण का भी संकट सामने था, लेकिन, हमने इन मूल्यों के संरक्षण का सदैव ध्यान रखा. कितना भी विकट काल क्यों न आया हमने इन मूल्यों के प्रति कोई समझौता कभी स्वीकार नहीं किया.

17. हिन्दू का मन अध्यात्म-दर्शन का प्रतिबिम्ब रखता है: प्रत्येक हिन्दू का मन ‘अध्यात्म-दर्शन’ तथा ‘संस्कृति’ का एक छोटा सा अंशरूप है. इस हिन्दू के मन में हमको ये सारी बातें किसी न किसी रूप में दिख जाती हैं. जब कभी कोई महापुरुष इस दर्शन के प्रकाश में अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए त्याग की भावनाओं को समाज के सम्मुख निष्कपट भाव से प्रकट करता है तब समझिये वही हिन्दू के हृदयस्थल पर अपनी अमिट छाप बना लेता है. हिन्दू उसके सम्मुख समर्पण भाव से श्रद्धावनत हो जाता है. क्योंकि, हिन्दू समाज के जीवन में तथा उसके हृदय में त्यागपूर्ण भावनाओं एवं करुणा के दृश्य बहुत महत्व रखते हैं. जो भी व्यक्ति अथवा संगठन इन बातों को लेकर सामने प्रस्तुत होता है तब यह हिन्दू समाज एक साथ उठकर उसका अनुगामी बन जाता है. अन्यथा निष्क्रिय और शान्त बैठा रहता है, इसका जो अत्यन्त भावुक स्थल है वह अध्यात्म ही है. उस अध्यात्म को ध्यान में रख करके ही वह बढ़ता है, इस अध्यात्म से ही वह प्रेरणा पाता है.

18. हिन्दू का महामानव सर्वत्यागी आत्म विजेता ही रहेगा: ‘हिन्दू-संस्कृति’ जिसको अपना आदर्श पुरुष स्वीकार करती है वह यूनान या रोम की तरह युद्धों का पराक्रमी विजेता नहीं हो सकता, अथवा कोई बड़ा भारी सरदार, सेनापति भी नहीं हो सकता. हजारों लोगों को जो मारता है तथा युद्ध में विजय पाता है अथवा बहुत बड़ी संम्पत्ति का स्वामी बन जाता है, वह हिन्दुओं का आदर्श पुरुष अथवा हमारी संस्कृति का आराध्य पुरुष कभी नहीं बना. इस संस्कृति ने जिनको आदर्श स्थान दिया, वे ऐसे थे जो समाज की भावनाओं से एकरूप थे. जो समाज की भावनाओं के लिये स्वयं को समर्पित करने का सामर्थ्य रखते थे. जिन्होंने अपना सब कुछ समर्पण कर दिया, वे ही लोग हमारे (हिन्दुओं के) आदर्श पुरुष बने. ध्यान रहे उनकी दृष्टि अध्यात्म-भाव से ‘एकात्मक’ थी, उनकी प्रज्ञा ‘सर्व-समावेशी’ थी. वे कहीं पर भी समाज में किसी भी प्रकार का भेद स्वीकार करने को तैयार नहीं थे. वे सच्चे अर्थों में समाज के प्रति परमत्यागी थे. भौतिक वस्तुओं के प्रति उनका आकर्षण कम होता चला गया. वे ही हमारे आदर्श पुरुष बन सके थे, ‘हिन्दू-संस्कृति’ उन्हीं को अपना आदर्श मानती रही है.

19. हिन्दू-संस्कृति का प्रवाह कोनों को समाप्त कर देता है: ‘हिन्दू-संस्कृति’ गंगा के प्रवाह की तरह है. जिस प्रवाह में टेढ़े-मेढ़े और बहुत सारे नुकीली पत्थर आ करके गिरते हैं लेकिन गंगा के प्रवाह की निर्मलता तथा उसके जल की मृदुलता और मधुरता के कोमल स्पर्श से वे गोल-गोल हो जाते हैं तथा अपने कर्कश, असहिष्णु एवं बर्बर व्यवहार के नुकीले कोनों को सहज ही छोड़ देते हैं. उदाहरण स्वरूप कैसी-कैसी अक्खड़ एवं दुर्द्धर्ष तथा क्रूर जातियाँ यहाँ भारत में आईं, किन्तु आश्चर्य की बात यह रही कि यहाँ के पावन स्पर्श के कारण वे अपने-अपने कोनों को घिसकर, गोल-गोल होती चली गईं. इस प्रकार, हम समझते हैं कि ‘हिन्दू-संस्कृति’ गंगा के प्रवाह की तरह है जो सभी के कर्कश व्यवहार को मधुरता में बदल देने का सामर्थ्य रखती है.

20. ‘हिन्दू-संस्कृति’ एक खरल की तरह है: हिन्दू-संस्कृति एक ऐसे खरल की तरह है जो बीसियों मसालों को कूटकर एक ऐसा समन्वित मिश्रण बना देती है, जिसमें प्रत्येक मसाले की अपनी विशिष्ट सुगंध और उसके वह विशिष्ट तत्व तो उसमें रहते ही हैं, किन्तु प्रत्येक मसाला अपनी स्वतंत्र एवं पृथक पहचान छोड़ देता है तथा अपनी सभी गुण सम्पदा लेकर सबके साथ मिल करके एकरस हो जाता है. ‘हिन्दू-संस्कृति’ ऐसी सभी जातियों, बिरादरियों को मिलाकर एक खरल की तरह से एक मिश्रित एवं एकात्म समाज के रूप में ले आती है.

21. हिन्दू-संस्कृति एक विशाल छत्र है: ‘हिन्दू-संस्कृति’ को एक बड़े छाते की उपमा भी हम दे सकते हैं, जो सभी को अपनी शीतल छाया देता है और इस छाते के नीचे कितने भी सम्प्रदाय और पंथ निर्विघ्न आश्रय पा सकते हैं.

22. यह एक ऐसे बड़े प्लेटफार्म की तरह भी मानी जा सकती है. जहाँ पर बहुत बड़ी संख्या में लोग खड़े हैं. किसी भी मार्ग पर जाने वाले इस प्लेटफार्म पर मिलकर खड़े होते हैं.

23. ‘हिन्दू-संस्कृति’ एक लीग ऑॅफ रिलीजन्स की तरह है जो सैकड़ों, सम्प्रदायों तथा पंथों को अपने भीतर समाये रख सकती है.

24. जो मिला वह गंगा ही हो गया: इस संकृति में बहुत सी धारायें आकर मिलीं. हमने इस संस्कृति को अलग-अलग नाम कभी नहीं दिया. जैसे- शकों की संस्कृति यह कभी नहीं कहा. यहाँ भारत में हूण आये किन्तु ध्यान देने की बात यह है कि यहाँ हूणों की संस्कृति यह नहीं कहा गया. यवन तथा कुषाण आदि प्रवाह भी यहाँ आयें पर यवनों की कुषाणों की संस्कृति यह कभी नहीं रही. छोटी-छोटी नदियाँ जिस प्रकार एक सुर-सरिता (गंगा) में मिलती चली जाती हैं किन्तु, नाम गंगा ही बना रहता है, उसी प्रकार यहाँ भी बहुत से प्रवाह आये और इसके अन्दर समाहित होते चले गये किन्तु, ‘हिन्दू-संस्कृति’ का प्रवाह वैसा का वैसा ही बना रहा.

25. हिन्दू-संस्कृति आत्म केन्द्रित अधिक है: ‘हिन्दू-संस्कृति’ का एक मौलिक बिन्दु यह भी है कि वह ‘आत्म-केन्द्रित’ अधिक है. हम ‘आत्म-चिन्तन’ के साथ-साथ ‘आत्म-उन्नति’, ‘आत्मानुभव’ ‘आत्म-नियंत्रण’ ‘आत्म-ज्ञान’, ‘आत्म-विजय’ तथा ‘आत्म-साक्षात्कार’ की बात करते हैं. हम ‘आत्म-शुद्धिकरण’ पर बल देते हैं. यह भारतीय (हिन्दू) संस्कृति का मौलिक दर्शन है. पाश्चात्य जगत में सामूहिकता है, साथ-साथ आइये, साथ-साथ प्रार्थना करिये, साथ-साथ अभ्यास करिये, साथ-साथ मिलकर के कोई काम करिये. सामूहिकता उनकी सभ्यता का एक बड़ा लक्षण है. जहाँ पश्चिमी सभ्यता ने दूसरों के ऊपर विजय को अधिक महत्व दिया. वहीं हमारी संस्कृति ने अपने ऊपर अर्थात् अपनी कामनाओं और इच्छाओं पर जो विजय है वही आत्मविजय है, उसको ही अधिक महत्व दिया. इसके कारण से उनकी पूजा सामूहिक और हमारी पूजा एकान्तिक हो गयी. हमारे ‘आत्मानुभव’ को अधिक महत्व दिये जाने के कारण से, ये पूजा सामूहिक हो भी नहीं सकती थी. ये हमारी संस्कृति की एक विशेषता है.

26. हर विपरीत परिस्थिति में जीवित रहने की क्षमता है: हमारी संस्कृति किसी भी विपरीत परिस्थिति में नष्ट नहीं होती. हर परिस्थिति में अनुकूलता ग्रहण करते हुए आगे बढ़ जाती है. क्या यह आश्चर्य की बात नहीं थी कि जिन लोगों ने हमारे मंदिर अनेक बार तोड़े वे ‘हिन्दू-संस्कृति’ और हिन्दू समाज की उन भावनाओं को नहीं तोड़ सके जो बार-बार उस खण्डहर पर एक नया मंदिर बनाने के लिये तैयार बैठी रहती थी और मौका मिलते ही पुनः वहाँ नया मंदिर खड़ा कर देती थी.

इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि ‘हिन्दू-संस्कृति’ अनंत प्रकार की विशेषतायें अपने में समाहित करके रखती है. ‘हिन्दू-संस्कृति’ की यह कुछ ऐसी विशेषतायें हैं जो इसको विश्व के ‘अन्य-विचारों’ से सर्वथा पृथक रखती है.

‘हिन्दू-दर्शन’, हिन्दुत्व, ‘हिन्दू-संस्कृति’ और ‘हिन्दू-राष्ट्र’ ये बड़े व्यापक शब्द हैं. ये विस्तृत चर्चा चाहते हैं. हमने संक्षेप में एक ऐसे दर्शन पर विचार किया जो वैदिक ऋषियों से प्रारंभ हुआ और धीरे-धीरे इसका प्रवाह आगे बढ़ा, हर युग में इसने कुछ न कुछ सुधार किया, पुरानी विकृतियों को दूर करने का प्रयास निरन्तर जारी रखा और प्रत्येक युग के महापुरुष से कोई न कोई बात ग्रहण कर ली, ऐसी ग्राह्यता इस दर्शन की है. हर काल में और हर परिस्थित में हम इस मौलिक दर्शन की रक्षा भी करते चले आये हैं.

यह दर्शन विशुद्ध रूप से ‘हिन्दू-दर्शन’ है, नाम चाहे कभी भी मिला हो लेकिन ‘वैदिक-दर्शन’ के रूप में लगभग 25 हजार वर्ष पूर्व से यह चलता आ रहा है. समय-समय पर बहुत लोग नाम बदलते हैं, क्षेत्रों के नाम बदलते हैं, शहर के नाम बदलते हैं. गंगा गोमुख से बढ़ती है और अपने बहुत से नाम बदल-बदल कर बढ़ती ही जाती है. किन्तु, उसका एक नाम गंगा सार्वकालिक प्रसिद्ध है. उसी तरह, ‘वैदिक-दर्शन’ एक लम्बी यात्रा करके हमारे सम्मुख आज खड़ा है. आज हमारे पास जो ‘हिन्दुत्व’ नाम है वह सर्वग्राह्य नाम है. लेकिन दर्शन वही पुराना है. उसी को लेकर ये ‘राष्ट्र’ खड़ा है. यह ‘राष्ट्र’ राजनीतिक नहीं, पांथिक नहीं, भाषायी नहीं, आर्थिक भी नहीं. यह ‘राष्ट्र’ सामाजिक समझौतों के आधार पर निर्मित हुआ है ऐसा भी नहीं. इसकी आधारशिला विशुद्ध दार्शनिक और आध्यात्मिक है. इस ‘राष्ट्र’ की सीमायें राजनीतिक कभी नहीं थीं. जब कभी ‘भारत’ का कोई व्यक्ति अमेरिका जाता है तब हम कहते हैं कि भारत का एक हिन्दू व्यक्ति अमेरिका में गया है. हम जानते हैं कि एक ‘भारत’ वहाँ चला गया. भारत का प्रतिनिधित्व करने वाला एक व्यक्ति वहाँ बैठा है, भारत का संस्कार ले करके वह व्यक्ति वहाँ बैठा है. अर्थात उसके मन में, उसके हृदय में, कहीं-न-कहीं एक संस्कार है उसको लेकर के वह वहाँ बैठता है. अर्थात ‘भारत-राष्ट्र’ ही कहीं न कहीं वहाँ बैठ जाता है. वह वहाँ पर ‘हिन्दू-राष्ट्र’ का एक प्रतिनिधि बन जाता है.

(राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी के 14  अगस्त 2014 को भोपाल में हिन्दुत्व, ‘हिन्दू-संस्कृति’ एवं ‘हिन्दू-राष्ट्र’ की अवधारणा पर दिए बौद्धिक के आधार पर)

 

 

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