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खिलाफत आंदोलन – जबरदस्ती और नरसंहार!

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डॉ. श्रीरंग गोडबोले

खिलाफत आंदोलन का अगस्त 1920 से मार्च 1922 तक का दूसरा चरण ज़बरदस्ती और नरसंहार का चरण था. इसमें असहयोग आंदोलन ने जहाँ एक ओर जोर-जबरदस्ती पर जोर दिया, वहीँ इसका अगला चरण हिंसा और नरसंहार का था.

खिलाफत और असहयोग – जुड़वां

यह एक गलतफहमी है कि असहयोग और खिलाफत आंदोलन एक साथ शुरू किये गए या फिर असहयोग के बाद खिलाफत आरम्भ हुआ. असहयोग आन्दोलन भारत को स्वतंत्रता दिलाने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया था यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है. इस विषय पर कुशाग्र बुद्धि के स्वामी डॉ.अंबेडकर का विश्लेषण अत्याधिक महत्वपूर्ण है. डॉ.अंबेडकर लिखते हैं, … श्री गाँधी खिलाफत के लिए न केवल मुसलमानों से सहमत थे बल्कि इस काम में उनके मार्गदर्शक और मित्र भी बन गये. खिलाफत आन्दोलन में श्री गांधी ने जो महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उस आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन में जो सबंध था वह क्षीण हो गया, क्योंकि अधिकतर लोग यह विश्वास करते थे कि  कांग्रेस ने ही असहयोग आन्दोलन शुरू किया है और वह इसलिए कि यह स्वराज पाने का एक साधन है. यह विचार सब जगह घर कर गया था क्योंकि अधिकांश लोग यही देखकर संतुष्ट हो गए थे कि असहयोग आन्दोलन और 7 और 8 सितम्बर 1920 को कलकत्ता में होने वाले कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में  संबंध था, परन्तु जिस ने भी सितंबर 1920 के बाद की स्थिति का अवलोकन किया है वह जानता है कि यह विचार सही नहीं है. सच्चाई यह है कि असहयोग आन्दोलन का उद्गम खिलाफत आन्दोलन से हुआ था, न कि स्वराज के लिए कांग्रेस के आंदोलन के रूप में. और कि इसे खिलाफतवादियों ने तुर्की की मदद के लिए शुरू किया था और कांग्रेस ने केवल खिलाफतवादियों की मदद करने के लिए इसे अपनाया था. इसका मूल उद्देश्य  स्वराज नहीं बल्कि खिलाफत था. और स्वराज का गौण उद्देश्य बनाकर उससे जोड़ दिया गया था, ताकि हिन्दू भी उसमे भाग लें और यह बात नीचे दिए गए तथ्यों से स्पष्ट हो जाती  है.

खिलाफत आंदोलन की शुरुआत 27 अक्टूबर 1919 को हुई समझी जा सकती है क्योंकि इसी दिन देश भर में खिलाफत सम्मलेन हुआ. इस अधिवेशन में मुसलमानों ने इस बात की संभावना पर विचार किया कि क्या असहयोग करके अंग्रेज सरकार को खिलाफत की गलती दूर करने के लिए विवश किया जा सकता है. 10 मार्च 1920 को कलकत्ता में खिलाफत सम्मलेन हुआ और उसमे यह फैसला कर लिया गया कि आन्दोलन के लक्ष्य को आगे बढाने के लिए असहयोग सर्वोत्तम हथियार हो सकता है.

9 जून 1920 को इलाहाबाद में खिलाफत सम्मलेन हुआ और वहां सर्वसम्मति से इस बात को दोहराया गया कि असहयोग का सहारा लिया जाए. सम्मलेन में इस काम के लिए एक कार्यकारी समिति गठित की गई जो विस्तृत कार्यक्रम तैयार करे और उसे लागू करे. 22 जून 1920 को मुस्लिमों ने वायसराय को सन्देश भेजा जिसमे कहा गया था कि यदि पहली अगस्त 1920 से पूर्व तुर्क लोगों की शिकायतें दूर न कर दी गईं तो वे असहयोग आन्दोलन शुरू कर देंगे. 30 जून 1920 को इलाहाबाद में खिलाफत कमेटी की बैठक हुई जहाँ यह तय किया गया कि वायसराय को एक महीने का नोटिस देकर असहयोग आन्दोलन शुरू कर दिया जाए. 1 जुलाई 1920 को यह नोटिस दिया गया और 1 अगस्त 1920 से असहयोग आन्दोलन शुरू हो गया. इस संक्षिप्त विवरण से पता चलता है कि असहयोग आन्दोलन खिलाफत कमेटी द्वारा शुरू किया गया जो खिलाफत सम्मलेन में पहले ही शुरू हो चुका था; और यह स्वराज के लिए नहीं, बल्कि खिलाफत आन्दोलन को बढाने में मुसलमानों की सहायता करने के लिए था. कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में जो प्रस्ताव पारित किया गया, उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है. (डॉ.अंबेडकर सपूर्ण वांग्मय खंड 15, पाकिस्तान या भारत का विभाजन, डॉ. बी. आर. अंबेडकर, डॉ.अंबेडकर प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, 2013 पृ.137-139).

असहयोग की खिलाफतवादी योजना

28, 29 फरवरी 1920 को, मौलाना आजाद ने कलकत्ता में खिलाफत कांफ्रेंस  की अध्यक्षता की. उन्होंने कहा कि शरीयत के अनुसार  किसी भी मुस्लिम का इस्लाम के गैर-मुस्लिम शत्रुओं के साथ मवाला(सहयोग) एक पाप था हालाँकि उन्होंने बड़ी चतुराई से इस श्रेणी से हिंदुओं को बाहर रखा था. उन्होंने असहयोग को इस्लामी ‘तर्क-ए-मवालत’(सामाजिक बहिष्कार) के रूप में परिभाषित किया और इसे मुसलमानों के लिए अनुशंसित किया क्योंकि उनके लिए यही एकमात्र उपाय बचा था (खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया, 1919-1924, मुहम्मद नईम कुरैशी, लंदन विश्वविद्यालय को प्रस्तुत किया गया शोध प्रबंध, 1973, पृ. 8). 11 मई 1920 को जिस शांति की शर्तों की घोषणा की गई उन्हें तुर्की की  स्वतंत्रता को नष्ट करने और उसके साम्राज्य को छीनने के वाला बताया गया. खिलाफतवादियों ने कांग्रेस के हिन्दू नेताओं का समर्थन प्राप्त करने के लिए, गांधी के परामर्श से सेंट्रल खिलाफत कमेटी की एक विशेष बैठक की. यह जून 1920 के पहले सप्ताह में इलाहाबाद में आयोजित की गई जिसमे हिन्दू-मुस्लिम नेताओं ने सहभागिता की.  (उल्लेखनीय है यह वही बैठक है जिसका उल्लेख ऊपर अंबेडकर द्वारा किया गया है). इस बैठक में, असहयोग की परिकल्पना चार चरणों में की गई:

  1. उपाधियों और मानद पदों का त्याग
  2. सरकार की सिविल सेवाओं में पदों का त्याग, इससे पुलिस को बाहर रखा जाना
  3. पुलिस और सेना में सेवा का इस्तीफा
  4. करों के भुगतान करने से इनकार करना

खिलाफत की तेज आवाजें

गांधी ने दिसंबर 1919 में खिलाफत मुद्दे पर सरकार द्वारा घोषित शांति समारोह के बहिष्कार की वकालत की. वह पंजाब के मुद्दे (जलियांवाला बाग हत्याकांड और मार्शल लॉ) को बहिष्कार के कारणों में जोड़ने के लिए तैयार नहीं थे. ख़िलाफ़त कांफ्रेंस की हिन्दू-मुस्लिम संयुक्त बैठक (24 नवंबर 1919) को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा, “व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि पंजाब के लोगों की  जो भी पीडाएं हों, हम एक स्थानीय मुद्दे पर खुद को इस समारोह से अलग नहीं कर सकते हैं जो कि संपूर्ण साम्राज्य से जुड़ा हुआ है… और इसके लिए खिलाफत ही वह मुद्दा है जिस पर हम शांति समारोह में शामिल होने से इंकार कर सकते हैं.” हालाँकि, खिलाफतवादियों ने पंजाब मुद्दे का फायदा उठाना शुरू कर दिया क्योंकि इसने व्यापक जन असंतोष को उभारा  था. गांधी ने भी अब खिलाफत के साथ पंजाब के मुद्दे को एक चारे के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, ताकि हिंदुओं को असहयोग आंदोलन के प्रति आकर्षित किया जा सके (कुरैशी, उक्त, पृ.112,113). पारंपरिक और  संवैधानिक रास्तों से कांग्रेस का हटना, एक बड़ा मुद्दा माना गया जिसके लिए कोलकाता में 4-9 सितंबर 1920 को कांग्रेस का एक विशेष सम्मलेन बुलाया गया (द हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन नेशनल कांग्रेस, पट्टाभि सीतारमैय्या, सीडब्ल्यूसी, मद्रास, 1935 , पृ. 336).

शत्रुतापूर्ण हिन्दू नेतृत्व

असहयोग आंदोलन के प्रति कई हिन्दू नेताओं के धुर विरोध ने खिलाफतवादियों को चिंतित कर दिया. मुस्लिम नेता एक भारतीय राष्ट्र के निर्माण हेतु हिंदुओं के साथ अपने मतभेद समाप्त करने के इच्छुक नहीं थे (हिस्ट्री ऑफ़ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, आर.सी. मजूमदार, खंड 3, पृष्ठ 64) . गांधी एक खिलाफतवादी के रूप खिलाफत फंड के व्यय पर देश का दौरा कर रहे थे. इसका अन्य हिन्दू नेताओं ने विरोध किया क्योंकि उन्हें लगता था कि यह सेन्ट्रल खिलाफत कमेटी द्वारा संचालित आंदोलन था. उदारवादियों ने इसे अपनी अवधारणा में ‘विचित्र और पूरी तरह से अव्यावहारिक’ पाया. ‘ श्रीमती एनी बेसेंट (1847-1933) जो भारत में  थियोसोफ़ी एवं होम रूल लीग की अगुआ थीं, ने इसे ‘राष्ट्रीय आत्महत्या’ बताया. सर पी.एस. सिवास्वामी अय्यर (1864-1946) जो मद्रास प्रेसीडेंसी के एडवोकेट-जनरल रहे, ने इसे ‘देश के लिए आपदा से भरा’ अभियान माना. वी.एस. श्रीनिवास शास्त्री (1869-1946) ने इसे अतार्किक और हानिकारक बताया तथा साथ ही अप्रैल 1920 में भविष्यवाणी भी की कि शीघ्र ही आंदोलन हिंसक हो जाएगा. मद्रास प्रेसीडेंसी के ही एडवोकेट जनरल रहे श्रीनिवास अयंगर (1874-1941)) ने इस आन्दोलन के तीसरे और चौथे चरण को ‘निश्चित रूप से अवैध और असंवैधानिक’ करार दिया. ऐसे ही विचार पंडित मदन मोहन मालवीय ने व्यक्त किये. कांग्रेस के संस्थापक सदस्य सुरेंद्रनाथ बनर्जी (1848-1925) ने भी इस संबंध में अपना सार्वजनिक अस्वीकरण जारी किया(कुरैशी, उक्त, पृ.154-155).

कांग्रेस के ‘अतिवादी’ इस विषय पर एकमत नहीं थे. हालांकि यह सार्वजनिक रूप से माना जा रहा था कि कि तिलक खिलाफत आंदोलन के साथ नहीं थे. परन्तु  तिलक द्वारा 1920 में कांग्रेस के भीतर स्थापित डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी के मेनिफेस्टो के अनुसार “यह पार्टी खिलाफत से जुडी समस्या के मुस्लिम मान्यताओं और कुरान के सिद्धांतों के अनुरूप समाधान के लिए मुस्लिमों के दावे का समर्थन करती थी(पट्टाभि सीतारमैय्या, उक्त, पृ. 327). मोतीलाल नेहरू हिंसा फैलने से चिंतित थे. सी आर दास, बी.सी. पाल, जी.एस. खापर्डे, एन.सी., केलकर, विट्ठलभाई पटेल जैसे अन्य नेता भी इससे सशंकित थे(कुरैशी, उक्त, पृ. 154-156). गांधी और खिलाफतवादियों के लिए दोनों के लिए कलकत्ता (सितंबर 1920) में कांग्रेस का विशेष सत्र महत्वपूर्ण था.

स्वराज से पहले खिलाफत

हिंदुओं को अपनी ताकत दिखाने के लिए खिलाफतवादियों ने कांग्रेस से असहयोग पर चर्चा करने से पहले अपना सम्मेलन (5 सितंबर 1919) आयोजित किया. खिलाफत कांफ्रेंस ने सर्वसम्मति से पुष्टि की कि असहयोग एक अत्यंत बाध्यकारी धार्मिक दायित्व था. शौकत अली और अन्य खिलाफतवादियों के अत्यधिक दबाव के कारण मुस्लिम लीग ने भी सेन्ट्रल खिलाफत कमेटी का अनुसरण करने का निर्णय लिया. हालाँकि जिन्ना ने इसके विरुद्ध चेतावनी दी थी. “श्री गांधी का तात्कालिक उद्देश्य कांग्रेस के विशेष सत्र को उनके पंथ में परिवर्तित करना था… लेकिन श्री गांधी ने इस हेतु सूक्ष्मता के  साथ तैयारियाँ की थीं. बॉम्बे और मद्रास से  ख़िलाफ़त स्पेशल ट्रेनों से कांग्रेस के प्रतिनिधियों को भरकर लाया गया जिन्हें पक्ष में वोट देने के लिए शपथ दिलाई गई थी. राष्ट्रवादियों ने शिकायत की… कि खिलाफतवादियों ने सभागार को बंद  कर दिया था और बहुमत के साथ छेड़छाड़ की थी.” (स्पीचेस एंड राइटिंग्स ऑफ़ एम के गांधी, इंट्रोडक्शन बाय सी एफ एंड्रयूज, मद्रास, 1922, पृ..46-48). असहयोग समिति में असहयोग के प्रस्ताव पर तीन दिनों तक  बहस चली  जिसे संकीर्ण बहुमत से स्वीकार किया गया था; 132 के मुकाबले 144 वोट से . मुस्लिम प्रभुत्व ने असहयोग के पक्ष में पलड़ा झुका दिया था.(कुरैशी, उक्त, पृ. 158)

असहयोग के संकल्प को आगे बढ़ाते हुए, गांधी ने कहा, “भारत के मुसलमान सम्माननीय व्यक्ति और अपने पैगंबर के विश्वास के अनुयायियों के रूप में नहीं रह सकते हैं, यदि वे किसी भी कीमत पर इसके सम्मान सुरक्षित नहीं रख पाते  हैं. पंजाब के साथ क्रूरतापूर्ण और बर्बर व्यवहार किया गया है. और इन दो गलतियों को दूर करने के लिए ही  मैंने इस देश के सामने असहयोग की योजना दी है.” पंजाब का मुद्दा स्पष्ट रूप से एक बाद में आया हुआ विचार था. यह याद किया जा सकता है कि रौलट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद भी, गांधी ने दिसंबर 1919 में अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में ‘असहयोग के एक हल्के रूप’ का भी विरोध किया था. उन्होंने पंजाब के मुद्दे पर सरकार के शांति समारोह संबंधी आदेश का बहिष्कार करने पर विचार करने से भी इनकार कर दिया था. अब एक वर्ष के भीतर, वह जोर शोर से असहयोग की वकालत कर रहे थे और अब जबकि साथ ही साथ इसमें पंजाब का मुद्दा भी शामिल था (मजूमदार, उक्त, पृ. 9)! असहयोग के संकल्प पर मुस्लिम वोट की संख्या पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.  ऐसा कहा जाता है कि वोटों के लिए बड़ी संख्या में कलकत्ता के टैक्सी ड्राइवरों को चोरी छुपे लाया गया. उस सत्र में 5,000 से अधिक प्रतिनिधि थे, हालांकि जिनमें से आधे ने मतदान नहीं किया था. असहयोग पर प्रस्ताव, 804 वोट के विरुद्ध 1,826 वोट से पारित हो गया (खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया1919-1924, ए सी नीमायर, मार्टिनस निजॉफ, 1972, पृ. 109).

अप्रैल 1920 में सेंट्रल खिलाफत कमेटी द्वारा लाये  गए असहयोग प्रस्तावों की तुलना (जो कि गांधी द्वारा तैयार किए गए थे) यदि सितंबर 1920 में कांग्रेस के विशेष सत्र द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव से करें, तो पता चलता है कि खिलाफतवादी, कांग्रेस से कहीं आगे जाने के लिए तैयार थे. और लगभग एक साल बाद, जब असहयोग आंदोलन मुसलमानों की शिकायतों का निवारण करने में विफल रहा, गांधी ने लिखा, कि ” अपने धीरतापूर्ण गुस्से के कारण मुसलमानों ने कांग्रेस और खिलाफत संगठनों से अधिक जोरदार और तत्काल कदम उठाने की मांग करनी शुरू कर दी. मुसलमानों के लिए स्वराज का अर्थ है, और होना भी चाहिए, खिलाफत के सवाल को सफलतापूर्वक हल करने में हिंदुस्तान की योग्यता. इसलिए यदि स्वराज प्राप्ति का मतलब ऐसे कार्यक्रम में अनिश्चित विलम्ब होना है, जिसमे उन्हें यूरोपीय समुद्रों में नपुंसकों की तरह तुर्की का विनाश देखना पड़े, तो मुसलमान प्रतीक्षा करना अस्वीकार करते हैं.

इस दृष्टिकोण से सहानुभूति न रखना असंभव है. यदि मुझे कोई प्रभावकारी तरीका समझ में आता तो मै अविलम्ब प्रसन्नतापूर्वक उसका अनुमोदन कर देता. यदि स्वराज की गतिविधियों को मुलतवी करने से हम खिलाफत के उद्देश्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ सके तो मैं ख़ुशी से ऐसा करने को तैयार हूँ. इस कारण करोड़ों मुसलमानों को जो पीड़ा हो रही है, उसे शांत करने के लिए यदि मुझे असहयोग के बाहर भी कोई मार्ग सूझेंगे तो मै बड़ी खुशी से उन्हें अपना लूँगा” (मजूमदार, उक्त, पृ. 96).

कट्टर इस्लामी शिकंजा

सेंट्रल खिलाफत कमेटी ने अपनी प्रचार समिति द्वारा प्रशिक्षित वेतनभोगी व्याख्याताओं को नियुक्त किया, साथ ही साथ प्रचार प्रसार करने के लिए गुप्त कार्यकर्ताओं और दूतों को नियुक्त किया. हर शाम, मुस्लिम स्वयंसेवकों ने बड़े शहरों की गलियों में ड्रिल और परेड की. खाकी कपड़ों में चाकू और भाले से लैस खिलाफत कार्यकर्ताओं ने खिलाफत की मांगों के समर्थन में राजनीतिक बैठकें कीं और असहयोग ने हिंसा का समर्थन करने वाले आन्दोलन का रूप धारण कर लिया. ‘इस्लाम खतरे में’ या ‘क्रिश्चियन ताकतों का छल’ जैसे अपने पुराने विषय का उपयोग कर, पैम्फलेट्स, कविताओं और वाद विवाद  के द्वारा  लोगों की भावनाओं को भड़काया गया. धनराशि की मांग के लिए प्रत्यक्ष अपील के अलावा, सेंट्रल खिलाफत कमेटी ने ’कागजी मुद्रा’ जारी की, जो एक रुपये की रसीदों के रूप में थे, जो आकार और प्रकार में एक-एक रुपये के नोट से मिलती-जुलती थी लेकिन इसमें उर्दू  में कुरान के उद्धरणों की छपाई की गई थी.

उलेमा ने धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ असहयोग का इस्तेमाल करने की भी इच्छा व्यक्त की; जिसमे विधायी निकायों को उलेमाओं की समिति द्वारा, “विधर्मी” न्यायालयों को शरिया अदालतों और सरकारी स्कूलों को दारुल उलूम द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना था. जमीयत-उल-उलमा-ए-हिंद ने कुरान और पैगंबर के कथनों पर आधारित एक मुत्तफिक़ (सामूहिक) फतवा जारी किया जो असहयोग आंदोलन की मांगों का मद दर मद समर्थन करता था(कुरैशी, उक्त, पृ.160-177;  यह भी देखें, खिलाफत मूवमेंट: रिलीजियस सिम्बोलिज्म एंड पोलिटिकल मोबिलाइजेशन इन इंडिया, गेल मिनॉल्ट, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1982, पृ. 146). मार्च 1921 को, जमीयत-उल-उलमा ने बरेली में यह निर्धारित किया कि असहयोग के विरोधियों को धार्मिक न्यायाधिकरणों के माध्यम से दंडित किया जाए (कुरैशी, उक्त, पृ. 191). खिलाफतवादियों ने कांग्रेस की विशाल मशीनरी और उसके सभी फंडों पर कब्जा कर लिया, जिसमें तिलक स्वराज फंड भी शामिल था, जिसमें कुल मिलाकर एक करोड़ पाँच लाख रूपये थे(कुरैशी, उक्त, 178; मिनॉल्ट, उक्त, पृष्ठ 126, 132). खिलाफत फंड के ब्योरों  और ऑडिट की मांग मार्च 1920 से बढ़ रही थी, लेकिन जुलाई 1920 तक कुछ भी नहीं हुआ. कई लोग यूरोप में खिलाफत प्रतिनिधिमंडल के भव्य खर्च से हैरान थे(मिनॉल्ट, उक्त, पृ. 137).

अमीर को आमन्त्रण

1921 की गर्मियों में खिलाफत के कुछ नेताओं  के भाषणों का स्वर पहले की तुलना में अधिक हिंसक हो गया. मुत्तफिक़ फतवे की प्रतियाँ जिसमे सेना की सेवा को हराम घोषित किया गया था, फरवरी से मई 1921 तक गुप्त रूप से वितरित की गई थी. इस प्रतिबंधित फतवे को भारतीय सेना की कई इकाइयों के बीच पर्चे के रूप में वितरित किया गया. सैनिकों को रिश्वत देने के लिए खिलाफत फंड  में से बड़ी धनराशि का उपयोग किया जा रहा था(कुरैशी, उक्त, पृ. 205). 1920-21 में अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करने की साजिश रची गई थी. 18 अप्रैल 1921 को मुहम्मद अली ने मद्रास में ‘भारत पर अफगान आक्रमण की स्थिति में भारतीय मुसलमानों के कर्तव्यों’ के विषय पर भाषण दिया. उन्होंने कहा कि अगर अमीर ने भारत को अधीन बनाने के लिए आक्रमण किया तो मुस्लिमों को इस हमले का विरोध करना चाहिए. लेकिन अगर उसका उद्देश्य  इस्लाम और खलीफा के उत्पीड़कों को हराने के लिए था, तो यह भारतीय मुस्लिमों का कर्तव्य होगा कि वे भारत सरकार से सभी सहयोग वापस ले लें, और यहां तक ​​कि अफगानों के साथ मिलकर इस्लाम की लड़ाई लड़ें. इस विचार के कारण हिंदुओं में बेचैनी बढ़ गई… गांधी ने यंग इंडिया में लिखा: “मैं एक तरह से अफगानिस्तान के अमीर की मदद जरूर करूंगा, अगर उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया, मैं खुलकर अपने देशवासियों से कहूंगा; कि एक ऐसी सरकार की सहायता करना अपराध होगा… जिसने सत्ता में बने रहने हेतु  राष्ट्र का  विश्वास खो दिया है ” (नीमायर, उक्त, पृ. 129,130) .

यू.पी. के गवर्नर बटलर ने वायसराय लॉर्ड रीडिंग को दिए एक नोट (12 जनवरी 1922) में यह निष्कर्ष निकाला था कि “इसमें कोई शक नहीं है कि मुस्लमान उपद्रवी तत्व हत्या और किसी भी तरह की हिंसा के लिए तत्पर है.”  कई स्थानों पर अवज्ञा की भावना भीड़ और पुलिस के बीच मुठभेड़ में परिवर्तित हो गई विशेष रूप से यू.पी. और बंगाल में. पुलिस स्टेशन और अन्य सरकारी इमारतें हमले के विशेष लक्ष्य बन गए (कुरैशी, उक्त, पृ. 221). मुस्लिम रक्त-पिपासा के बारे में बटलर के शब्द भविष्यवाणी साबित हुए!

चौरी चौरा नरसंहार

4 फरवरी 1922 को, गोरखपुर जिले के चौरी चौरा स्थित थाने  पर 3000 से 5000 प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने चढ़ाई कर दी. इस मुठभेड़ में भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया जिसके जवाब में पुलिस ने पहले हवा में और फिर भीड़ पर गोलियां चलाई. जब भीड़ को पता चला कि पुलिस के पास गोला-बारूद की कमी है, तो उसने पुलिस को भागने पर मजबूर कर दिया. इनमे से कुछ बाहर खेतों में  भाग गए जबकि कुछ ने इस इमारत में शरण ली. भीड़ ने थाना भवन में आग लगा दी गई जिसमे सभी 21 पुलिस और चौकीदार मारे गए. सब-इंस्पेक्टर के एक नौकर जो एक छोटा लड़का था, की भी हत्या कर दी गई. ज्यादातर पुलिसकर्मियों को लाठी-डंडों और ईंट-पत्थरों से पीट-पीटकर मार डाला गया और कई शवों पर भाले के निशान के निशान भी थे. गांधी ने सार्वजनिक रूप से इस हिंसा पर पश्चाताप किया और अपने आंदोलन को अचानक बंद कर दिया (कुरैशी, उक्त, पृ. 223).

सबाल्टर्न इतिहास की आड़ में, चौरी चौरा की घटना को किसानों के प्रकोप के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया जा रहा है.  इसके लिए शाहिद अमीन द्वारा लिखित  इवेंट, मेटाफ़ोर, मेमोरी: चौरी चौरा, 1922-1992, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1995  का अध्ययन करने की आवश्यकता है. चौरी चौरा आगजनी करने वालों की धार्मिक प्रेरणाएँ बढ़ा चढ़ा कर दिखाई गई हैं. लेकिन इसी  किताब से उद्धृत तथ्य तो झूठ नहीं बोल सकते. 1921-22 की सर्दियों में, खिलाफत और कांग्रेस स्वयंसेवी संगठनों को एक समग्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक कोर में मिला दिया गया था. 1921 के मध्य में, चौरी चौरा पुलिस स्टेशन के एक मील पश्चिम में एक गाँव छोटकी डुमरी में ऐसे स्वयंसेवकों की एक ग्राम इकाई (मंडल) स्थापित की गई थी. चौरा के एक व्यक्ति लाल मोहम्मद साईँ ने गोरखपुर जिला कांग्रेस और खिलाफत समितियों के एक पदाधिकारी को इस ग्राम की  इकाई की स्थापना के लिए आमंत्रित किया था. ख़िलाफ़त के प्रमुख मौलवी सुभानुल्ला ही जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी थे. डुमरी इकाई औपचारिक रूप से गोरखपुर खिलाफत समिति के उपाध्यक्ष हकीम आरिफ द्वारा स्थापित की गई थी (अमीन, उक्त, पृ.14-16) . हकीम आरिफ ने एक व्याख्यान दिया, कुछ ‘अधिकारियों’ को नियुक्त किया और शाम की ट्रेन को वापस अपने जिला मुख्यालय चले गए. स्वयंसेवकों को शनिवार, 4 फरवरी, 1922 को डुमरी में एकत्र होने के लिए कहा गया. किया गया था. दंगे वाले दिन सुबह डुमरी की बैठक में, एक आदमी ‘हरे रंग का चश्मा पहने’ आया और उसकी भाषा से स्पष्ट  प्रतीत होता था कि वह एक मुस्लमान है’ और उसने ‘कागज़ की एक पर्ची से पढ़ना शुरू कर दिया.’ एक गीत गाते हुए उसने उपस्थित भीड़ से  मोहम्मद और शौकत अली की तरह, कैद को गले लगाने के लिए उकसाया. गीत के बाद आदमी वहां से चुपचाप निकल गया. ‘भीड़’ जिसे नज़र अली  ने शपथ दे रखी थी अब थानेदार से स्पष्टीकरण मांगने के लिए हुजूम लेकर चल पड़े. थानेदार गुप्तेशर सिंह द्वारा प्रभावशाली ’व्यक्तियों (मलिकों) को इकट्ठी भीड़ को हटाने के लिए भेजा गया. पर यहाँ उनकी बेइज्जती की गई और उनके मंतव्यों पर सवाल उठाये गए(अमीन, उक्त, पृ.1-16-16, 171).

वह शनिवार का दिन था जब खाल और चमड़े  के लिए विशेष हाट भोपा में लगा हुआ था, जो रेल गोदाम के नजदीक था… भोपा में आस-पास के गाँवों के अधिकांश मुस्लिम किसान इस चमड़े की हाट में आते थे. भोपा के मुस्लिम प्रभुत्व को एक मस्जिद द्वारा समझा जा सकता था, जो बाजार के सामने ही थी… अधिकांश हिन्दू शनिवार को भोपा से दूर रहते थे, खालों की  बदबू इस व्यापार से जुड़े किसी प्रतिबद्ध व्यापारी को छोड़कर, अन्य किसी को यहाँ से दूर रखने लिए पर्याप्त थी (अमीन, उक्त, पृ. 24-25).

एक संस्करण के अनुसार, दंगे  में शामिल असली लोग  चौरा चौरा से बीस मील दक्षिण-पूर्व में एक पठान-व्यापारी बहुल गाँव मदनपुर से थे. मदनपुर के गाडी वालों ने सुझाव दिया कि रेलवे ट्रैक पर पड़े पत्थरों का पथराव के लिए  इस्तेमाल किया जाए. इन्हीं गाडी वालों ने थाने को जलाने के लिए प्रयोग किये गए केरोसिन की आपूर्ति की. इस उपद्रव के कारण, व्यापारी अपनी चावल और कच्ची चीनी से लदी गाड़ियाँ निकाल कर ले गए(अमीन, उक्त, पृ. 33, 132).

चूंकि धुँआ बहुत था और इसलिए वे (पुलिसकर्मी) सभी थाने से बाहर आ गए. नज़र अली और शिकारी तथा मदनपुर के चार-पाँच पठानों ने कहा: आप सभी को ध्यान रखना चाहिए ताकि कोई भी बच कर भाग न सके. मेवा लाल ने बताया (जिसने अपने पिता से यह वृत्तान्त सुना था) यहाँ कहा जा रहा था “तुम क्या मारोगे हम मारेंगे. उसके अनुसार ‘थाना जलाने में मदनपुर के पठानों  का का बहुत हाथ था, वह सब “ट्रेडर” (व्यापारी) थे(अमीन, युक्त, पृ.231). हमलावरों की धार्मिक संरचना और प्रेरणाओं को वफ़ादारी से छुपा कर रखा गया है. इन भयावह वर्षों में जबरदस्ती और नरसंहार का प्रतिनिधित्व करने वाली दो घटनाएं सामने आईं. अफगानिस्तान के लिए एक हिज़रत (सामूहिक मुस्लिम उत्प्रवास) के रूप में ज़बरदस्ती थी; और नरसंहार ने बर्बर मोपला जिहाद का रूप ले लिया. दोनों पर अलग से चर्चा की जरूरत है.

(लेखक ने इस्लाम, ईसाई धर्म, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धी आंदोलन और धार्मिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं)

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