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शारदीय नवरात्र : वनदुर्गाओं की कहानी …कातकरी समुदाय का गौरव – ठमाताई पवार

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नवरात्रि प्रकृति के साथ एकजुट होने और एक साथ मनाने का उत्सव है. नवरात्रि में ऊर्जा, शक्ति, वीरता, पराक्रम की परंपरा है. नवरात्रि यानि आसुरिक विचारधारा पर विजय. हम भारतीय अपने ‘देश’ को एक मां या देवी के रूप में देखते हैं. (भारत माता)

नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है. अपने आस-पास देखें तो देवी के नौ रूप हमारे घर में, चारों ओर मिल जाएंगे. मां, बहन, सहेली, ननद, सास, दादी, मौसी, बुआ, बेटी और हमारी कामवाली – ऐसे कई रूपों में हमें कात्यायनी, शैलपुत्री, सरस्वती, महादुर्गा मिलते हैं. लेकिन हम शक्ति की पूजा करने वाली उन वनदुर्गाओं के बारे में नहीं जानते हैं, जिनके बारे में हमें जानना चाहिए. महिलाएं कभी-कभी समाज द्वारा अनदेखी के कारण और कभी हीनभावना के कारण आगे नहीं आ पाती. जंगल में बिखरी होती हैं, जिनके पास ज्ञान का भंड़ार होता है, जो अपने पैरों पर खड़ी होती हैं और दूसरों के जीवन में भी मूल्य जोड़ने वाली हैं. नवरात्रि के अवसर पर कुछ ऐसे ही वन दुर्गाओं का परिचय दे रहे हैं. उनकी ऊर्जा, हमारी संस्कृति से जुड़ी कड़ी को समाज के सामने लाने का यह प्रयास…

ठमाताई पवार – कार्य से छोड़ी प्रेरक छाप

जनजाति समुदाय के लिए आदर्श महिला हैं ठमाताई. कातकरी समाज का गौरव.

व्यक्ति जहां कहीं भी पैदा हो, लेकिन समाज में उसकी पहचान होती है उसके काम के कारण. कातकरी समुदाय से आने वाली ठमाताई पवार ने अपने काम के बल पर समाज के लिए आदर्श स्थापित किया है. रसोई पकाने के लिए आश्रम विद्यालय से जुड़ी ठमाताई ने न केवल वहीं पढ़कर उन्नति की, बल्कि आश्रम विद्यालय के विस्तार में भी किमती योगदान दिया. इसलिए ठमाताई को महाराष्ट्र के प्रमुख सामाजिक व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता है.

कर्जत (जिला रायगढ़) के जनजाति क्षेत्र के निवासियों के लिए आय का मुख्य स्रोत है मजदूरी. इसलिए गांव के सभी परिवारों में गरीबी व्याप्त है. ठमाताई का जन्म ऐसे ही एक परिवार में हुआ था. सिर्फ आठ साल की आयु में उनका विवाह संपन्न हुआ. विवाह के बाद कुछ काम दिलाने के इरादे से उनकी सास उन्हें होस्टल ले आई और ठमाताई कल्याण आश्रम की ही बनकर रह गईं. घर में आर्थिक रूप से योगदान देने के उद्देश्य से उन्होंने जांभिवली (ता. कर्जत) गांव के वनवासी कल्याण आश्रम में खाना बनाना शुरू किया. पहले वह रोटी बनाती थी. भजन करने और सीखने में अत्यंत रूचि होने के कारण मिट्टी और आटे पर अक्षर लेखन करने लगीं. अक्षरों से उनकी यह नजदीकी और शिक्षा की इच्छा को ध्यान में रखते हुए उन्हें भी पढ़ाना शुरू किया गया. ठमाताई एक ही समय में साक्षर और शिक्षित हो गई. एक सामान्य कातकरी जनजातीय महिला का सक्षम, निडर और कुशल व्यक्तित्व बन गया. इसमें कल्याण आश्रम की महत्त्वपूर्ण भूमिका है.

मूल रूप से सामाजिक कार्यों में रूचि रखने वाली ठमाबाई को समाज के लिए कुछ करने की आस चुप बैठने नहीं दे रही थी. उन्होंने नशे की लत रोकने, साक्षरता और स्वास्थ्य के बारे में जागरण करने का काम भजनों के माध्यम से शुरू किया. साथ ही पाड़ों पर बालवाड़ियां शुरू कीं. घर-घर जाकर बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रेरित किया. भजन और कीर्तन के माध्यम से महिला जागरण का कार्य किया. महिलाओं में नशे की लत उन्हें बेचैन कर रही थी. वहीं से उन्होंने शराबबंदी के लिए जोरदार प्रयास शुरू कर दिए. महिलाओं में नशे की लत के कारण का पता लगाकर क्या उपाय हो सकता है, इसकी जानकारी ली. रोजगार के अभाव में नशे की लत लगाने वाली महिलाओं को रोजगार के अवसर प्रदान कर महिलाओं को नशे से मुक्त कराने का प्रयास किया. जनजाति समाज की निरक्षरता का फायदा उठाकर आर्थिक शोषण की प्रवृत्ति के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी.

इसी कार्य को ध्यान में रखते हुए वनवासी कल्याण आश्रम ने ठमाताई को संगठन के कार्य में शामिल किया. महाराष्ट्र में 18 आश्रम  विद्यालय और उनके आसपास के क्षेत्र में शिक्षा का प्रसार और जनजातियों के समग्र विकास के लिए काम कर रही हैं. वर्तमान में, वह कल्याण आश्रम के कोंकण क्षेत्र की अध्यक्षा हैं. उनके कार्य को देखते हुए उन्हें हीराकणी पुरस्कार, मातृस्मृति पुरस्कार, दधिचि पुरस्कार, वी. शांताराम पुरस्कार आदि से सम्मानित किया गया है. महाराष्ट्र सरकार द्वारा आदिवासी सेवक पुरस्कार और केंद्र सरकार द्वारा अहिल्या देवी होलकर स्त्री-शक्ति पुरस्कार मिला है.

प्रत्यक्ष कार्य…

एक बार कोटा (राजस्थान) में महिलाओं की सभा हुई. बड़े स्कूल के एक हॉल में बैठक चल रही थी. वह स्कूल आवासीय था. स्कूल में लड़कों और लड़कियों के लिए छात्रावास होने के कारण सभी सुविधाएं थीं. सभी को अपना काम पूरा करके सत्र में जाने की जल्दी थी. एक बड़े बाथरूम में 5/6 नल थे. एक बार में 5/6 महिलाएं आसानी से काम चला सकती थीं. वह बाथरूम बच्चों को ध्यान में रखकर बनाया गया था. महिलाओं ने जल्दी से जल्दी सब कुछ खत्म करने के लिए साबुन के रैपर, खाली शैम्पू के पैकेट कचरे के डिब्बे के बजाय बाथरूम में फेंक दिए. शैम्पू, साबुन के रैपर और बाल सब पाइप में फंस गए और पानी ओवरफ्लो हो गया. सभी को घिन आने लगी. ठहरे हुए पानी में खड़े होकर नहाना मुश्किल हो गया. लेकिन पानी ओवरफ्लो होने की वजह किसी ने नहीं देखी. ठमाताई ने यह देखा और वह तेजी से आगे बढ़ीं, सीधे हाथ से जाली खींचकर बांह तक हाथ डाला और पूरे कचरे को बाहर निकाल कर कूड़ेदान में फेंक दिया. इतने समय से जमा हुआ पानी पल भर में बह गया. लेकिन उनके चेहरे पर ‘मैंने यह किया’ का भाव नहीं था. तुरंत नहाकर वे चली भी गईं. उनकी सहज वृत्ति का भाव हमेशा कई कार्यों से अनुभव किया जा सकता है.

सबके साथ घुलने-मिलने वाली, सहजता से बोलने वाली, सबका ख्याल रखने वाली, इतने पुरस्कार मिलने के बाद भी ‘ये कल्याण आश्रम का पुण्य है, मेरा कुछ भी नहीं’ कहते हुए आश्रम को बड़ा बनाने वाली, कई कातकरी महिलाओं को सामने लाने वाली, खूबसूरत आवाज में भजन करने वाली, कीर्तन के जरिए कई लोगों को अपना काम बताकर कल्याण आश्रम से जोड़ने वाली…!! उनके ऐसे कई रूप हैं!

ठमाताई यानि खास कातकरी ढंग से पहनी हुई साड़ी, माथे पर बड़ी बिंदी, बालों का गुच्छा, जैसे पांडुरंग की रुख्मिणी!!! उनका हंसमुख, मुस्कुराता हुआ व्यक्तित्व हमेशा आंखों के सामने रहता है.

वनदुर्गा ठमाताई के कार्यों को प्रणाम…

वैशाली देशपांडे

पश्चिम क्षेत्र महिला कार्य सह-प्रमुख, वनवासी कल्याण आश्रम

(विश्व संवाद केंद्र, पुणे)

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