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महाभारत का धर्मसंकट

Mahabharat ka Dharmsankatजुये में हारने के बाद जब दु:शासन द्रौपदी के केशों को पकड़कर खींचते हुए राजसभा में लाता है तो द्रौपदी भरी सभा में पूछती है कि हे विद्वज्जनो! क्या मैं धर्म के द्वारा जीती गई हूं? लेकिन, धर्मनिष्ठ, धर्मवेत्ता होने के बावजूद राजसभा में बैठे भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य जैसे मर्मज्ञ द्रौपदी के इस प्रश्र का जवाब नहीं दे पाते. इसे व्दंव्द कहें या उन्नति और संपन्नता के शिखर पर पहुंचे उस समाज की सच्चाई जहां नैतिकता अर्थ (धन) से हार जाती है.

इसकी बानगी महाभारत के भीष्म पर्व में दिखती है. कुरूक्षेत्र के मैदान में दोनों तरफ की सेनायें आमने-सामने खड़ी हैं और युधिष्ठिर युद्ध की अनुमति मांगने के लिये पितामह, द्रोण, कृपाचार्य और शल्य के पास जाते हैं. इन चारों ने लगभग एक सा तर्क देकर युधिष्ठिर को आश्वस्त किया कि हम दुर्योधन के पक्ष में इसलिये युद्ध कर रहे हैं, क्योंकि हम उसके द्वारा दिये जाने वाले धन के दास हैं, लेकिन मन से हम आपके साथ हैं. पितामह भीष्म कहते हैं – ”महाराज युधिष्ठर पुरुष अर्थ का दास है. यही सत्य है. मुझे कौरवों ने इसी अर्थ से बांध रखा है. हे कुरूनंदन! मैं तुम्हारे सामने नपुंसक की तरह बात कर रहा हूं कि धृतराष्ट्र के पुत्रों ने मेरा भरण-पोषण किया है, इसलिये युद्ध को लेकर मैं तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता. तुम इसके अतिरिक्त कुछ और मांग लो.’’

भारतीय संस्कृति के अध्येता और संस्कृत भाषा के विद्वान सूर्यकांत बाली ने ‘महाभारत का धर्मसंकट’ नामक अपनी पुस्तक में उसके हर पात्र का आधुनिक और तत्कालीन सामाजिक संरचनाओं, मान्यताओं और नैतिकता को लेकर धर्म के तराजू पर तौलते हुए सरल और प्रवाह के साथ निर्मम विश्लेषण किया है. सूर्यकांत बाली दैनिक समाचारपत्र नवभारत टाइम्स के संपादक रह चुके हैं. इससे पहले वे दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य भी कर चुके हैं. 9 नवंबर 1943 में मुलतान (अब पाकिस्तान) में जन्मे श्री बाली संस्कृत भाषा में दिल्ली विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. करने के बाद अध्ययन-अध्यापन और लेखन कार्य से जुड़े रहे.

बाली ने अपनी पुस्तक में वैभव और तकनीक की प्रवीणता के बाद समाज में उत्पन्न होते संकट की गहरी विवेचना की है. उन्नति के साथ ही समाज के मूल्यों के प्रति दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है. ऐसे में मूल्यों, आदर्शों और मर्यादाओं में निर्णायक कमी आती है. आज अमेरिका और यूरोप इसके उदाहरण हैं. मूल्यों और मर्यादाओं की हीनता के परिणामस्वरूप समाज जिन तनावों और व्दंव्द में जीता है, उससे महाभारत जैसा महाभयानक महासंग्राम ही जन्म ले सकता है. महाभारत के 18 दिनों के युद्ध में 18 अक्षौहिणी सेना यानी 20 लाख पैदल सैनिक, 21,870 रथ, 21,870 हाथी और 65,610 घोड़े मारे गये थे.

बाली ने अपनी पुस्तक में बताया है कि पितामह के भाई और एक अविवाहित माता का पुत्र होने के बावजूद वेद व्यास ने महाभारत के पात्रों का जिस निरपेक्षता के साथ चरित्र-चित्रण किया है, वह अपने आप में अनूठा है. व्यास ने तत्कालीन सामाजिक मान्यताओं और मूल्यों से विरचित होते पात्रों का न सिर्फ चरित्र-चित्रण किया है, बल्कि अपने महाभारत जैसे महाकाव्य के जरिये उन्होंने धर्म (मजहब या रिलीजन नहीं, बल्कि आचरण और कर्तव्य) को पारिभाषित किया है. इसी परिभाषा के अंतर्गत उन्होंने गीता जैसा तत्वज्ञान दिया, जो आज भारतीय जनमानस की जिंदगी का हिस्सा है.

श्री बाली ने अपनी एक अन्य पुस्तक ‘भारत गाथा’ में भी भारत की वैदिक संस्कृति, संस्कार, नैतिकता, मर्यादा और मूल्यों को सुविचारित रूप से रखा है.

सुधीर गहलोत

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